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शनिवार, 21 जुलाई 2012

जिसे भी मनायें हम मनायें


जिसे भी मनायें हम मनायें
हमारे दुःख ना जाना कोई
किसे कहें तकलीफ हमारी
हमें सुनने वाला नहीं कोई
हमें तो आदत है सहने की
क्यों हमें दिलासा दे कोई
ना पहले दुआ का असर हुआ
ना अब आगे उम्मीद कोई
अब मुस्काराते हुए जीना है
अब और चारा भी नहीं कोई
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
30-05-2012
544-64-05-12

समय के साथ



समय के साथ
उम्र बढ़ती
सोच बदलता
रिश्ते बनते बिगड़ते
नए अनुभव
नए अहसास होते
अच्छे बुरे का पता
चलता
नहीं बदलती तो
फितरत नहीं बदलती
बढ़ती उम्र के साथ
अपनी फितरत भी
बदल दो
ज़िन्दगी को कुछ
अच्छे पल दे दो
अनुभव को सार्थक
 कर दो
30-05-2012
543-63-05-12

शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

श्रेष्ठ होने का अहम्

अकेला देख कर
आज सूनी पगडंडी भी
हँस रही थी
किनारे लगे पेड़
आश्चर्य से देख रहे थे
पेड़ पर बैठी कोयल भी
क्रोध में
जोर से कूंकने लगी
मानो सब अहसास
कराना चाहते थे
तुम्हारे बिना मेरा कोई
अस्तित्व नहीं है
भावना हीन
हाड़ मांस के पुतले से
अधिक नहीं हूँ
मात्र पुरुष होने के कारण
तुमसे श्रेष्ठ होने का
अहम् चूर चूर हो गया
मुझे सत्य का पता चल गया
पती पत्नी में ना कोई
श्रेष्ठ होता
ना ही निकृष्ट होता
एक में कमी की पूर्ती
दूसरा करता
अब लौट कर आ जाओ
मुझे प्रायश्चित करने में
सहयोग दो
तुम्हारे बिना वह भी
ठीक से नहीं कर पाऊंगा
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
29-05-2012
542-62-05-12

चाहत की इन्तहा



हमारी चाहत की
इन्तहा ही कहिये
वो  रकीब से अकेले में
गुफ्तगू करते रहे
कहीं बदनाम ना
हो जाएँ
कोई देख ना ले
दोनों को
फ़िक्र में हम परेशां
होते रहे
उनके घर के बाहर
चहल कदमी करते रहे
28-05-2012
541-61-05-12

हम उन्हें दोस्त समझते रहे



हम उन्हें
दोस्त समझते रहे
वो हमें
दुश्मन मानते रहे
वो ज़ख्म देते रहे
हम खामोशी से
खाते रहे
28-05-2012
540-60-05-12

शौक से



हम ज़ख्मों पर
लगाने के लिए
मलहम की तलाश में
भटक रहे हैं
वो बड़े शौक से
मारने के लिए असले
इकट्ठे कर रहे हैं
अपनी हैवानियत का
सबूत दे रहे हैं
28-05-2012
539-59-05-12

मेरे चेहरे पर झलकता है दर्द जब



मेरे चेहरे पर
झलकता है दर्द जब
उनके चेहरे पर
मुस्काराहट आ जाती
कितनी मोहब्बत हैं
हमसे 
असलियत पता 
चल जाती
28-05-2012
538-58-05-12

शौक-ऐ-मोहब्बत में



हम 
शौक-ऐ-मोहब्बत में
उनसे गुफ्तगू करते रहे
वो शौक-ऐ-गुफ्तगू में
हमसे गुफ्तगू करते रहे
जब हकीकत पता चली
हम ज़ख़्मी हो कर
आंसू बहाते रहे
वो किसी और से 
गुफ्तगू करते रहे
28-05-2012
537-57-05-12

जब से देखा उनको



जब से देखा उनको
मैंने आइना देखना
छोड़ दिया
उनके सूरत के आगे
अब खुद की सूरत भी
अच्छी नहीं लगती
28-05-2012
536-56-05-12

दिल-ऐ-कातिल



देखा जो
चेहरा उनका करीब से
जान ली हकीकत
छुपी थी जो चमकते
चेहरे के पीछे
दिखा एक
दिल-ऐ-कातिल  मुझे
मासूमियत के पीछे
या तो हकीकत
भूल जाऊँ
उनसे दिल लगाता रहूँ
शौक-ऐ-मोहब्बत में
पेश कर दूं
दिल को
क़त्ल होने के लिए
या उन्हें भूल जाऊँ
बचा लूं जान
दिल के
क़त्ल होने से पहले
28-05-2012
535-55-05-12

बड़ी शिद्दत से वो बोले



हमने माँगा था
निम्बू पानी
उन्होंने शराब का
गिलास दे दिया
हमने कहा
हम पीते नहीं हैं
बड़ी शिद्दत से वो बोले
हमारे खातिर ही पी लो
बाद में हमें
होठों से पिला देना
28-05-2012
534-54-05-12

गुरुवार, 19 जुलाई 2012

हमारे ग़मों को आँसूं ना दो


हमारे ग़मों को
आँसूं ना दो
तुम्हारा हँसने का 
वक़्त है
खुल कर हँस लो
नकाब उठ चुका
तुम्हारे चेहरे से
तुम भी ज़माने के
साथ चलते हो 
खुद रुलाने के
हालात
पैदा करते हो
फिर मनाने को
कंधा देते हो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
शायरी
28-05-2012
533-53-05-12

जब तक थे साथ हमारे



जब तक 

थे साथ हमारे
कदम नहीं 
बहकते थे उनके
हुए जब से जुदा हमसे
होश नहीं उनको
मदहोश भी इतने
सम्हाले नहीं सम्हलते
गरूर भी इतना
मुंह से नहीं कहेंगे
फिर साथ चाहिए
हमारा
उनकी शर्तों पे
हम आगे बढ़ कर
हाथ भी थाम ले
तो छुडायेंगे भी नहीं
पर कहेंगे ज़रूर
तुम्हें ही ज़रुरत
हमारी
हम तो पहले ही
खुश थे
28-05-2012
532-52-05-12

बुधवार, 18 जुलाई 2012

खुदा से पूछा मैंने एक दिन


खुदा से पूछा 
एक दिन
क्यूं उसनेज़मीं पर
बसेरा नहीं बसाया
खुदा ने जवाब दिया
इंसान के दिल से
नफरत
साफ़ करते करते
हाथों में छाले पड़ गए
गर ज़मीं पर बसेरा
बसाता 
अपना वजूद ही
खो देता
मैं भी नफरत से जीने
 लगता 
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
19-05-2012
528-48-05-12

मंगलवार, 17 जुलाई 2012

कैक्टस


अनंत काल से
कालजयी मुस्कान लिए
मरुधर में निश्चल खडा हूँ 
धूल भरी आँधियों से
अकेला लड़ रहा हूँ 
लड़ते हुए भी हरीतिमा का
आभास दे रहा हूँ
सदियों से
मुझे भस्म करने का
प्रयत्न कर रही
आग उगलते सूरज की
तपन को सह रहा हूँ
पथ से डिगाने की
हर कोशिश को
नाकाम करता रहा हूँ
स्वयं पर अडिग विश्वास
मुझे काल कवलित
होने से बचाता रहा
मेरी मुस्कान को
क्रंदन में
बदल नहीं पाया
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
15-05-2012
527-47-05-12

बिना भावनाओं के जीवन



कोई पंछी ना उड़ता
सितारा ना जगमगाता
चाँद बादलों के पीछे
छुपा रहता
सूरज कभी ना उगता
तो आकाश को कौन
पूछता
विशाल और विस्तृत
होते हुए भी गौण होता
उस मैदान सा जिसमें
ना घास ना वृक्ष
उस सूने राजमहल सा
जिसमें कोई नहीं रहता
सन्नाटा जहां काटने को
दौड़ता
विशाल के साथ सूक्ष्म
भी आवश्यक होता
बिना भावनाओं के
जीवन होते हुए भी
व्यर्थ होता 
सूने आकाश से कम
नहीं लगता
15-05-2012
527-47-05-12

मत पूछो इस बार का सावन कैसा होगा ?


मत पूछो 
इस बार का सावन 
कैसा होगा ?
बिना महक के
फूलों का होगा
ना कोयल कूंकेगी
ना पपीहा बोलेगा
कोई भंवरा गुंजन
ना करेगा
प्रेमी युगल झूला
ना झूलेगा
कोई सावन गीत
ना गायेगा
कोई बादल खुल कर
ना बरसेगा
ना मन झूमेगा
ना ह्रदय
प्रेम हिलोरें लेगा
सावन में भी दिल
मायूस होगा
बिन उनके सब
सूना होगा
मत पूछो इस बार
का सावन कैसा होगा ?
15-05-2012
526-46-05-12

सोमवार, 16 जुलाई 2012

चला था सुकून ढूँढने ,बेचैनी मोल ले बैठा


बेचैनी मोल ले बैठा
चलते चलते रास्ते में
दिल लगा बैठा
जाना था कहीं और
कहीं और जा पहुंचा
मंजिल की तलाश में
रास्ता भटक बैठा
मिलेगा रास्ता भी
पहुंचूंगा
मंजिल पर भी कभी
उम्मीद में
उन्हें खुदा मान बैठा
चला था सुकून ढूँढने
बेचैनी मोल ले बैठा
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
15-05-2012
525-45-05-12

रविवार, 15 जुलाई 2012

ना कोई गुल तोड़ा था ना ही,शाख से रिश्ता जोड़ा था


गुल तोड़ा था
ना ही
शाख से रिश्ता
जोड़ा था
शौके-ऐ-मोहब्बत में
बस निगाहें उठा कर 
देखा था
दुश्मनों का दिल
जलाने के लिए
उतना ही काफी था

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
15-05-2012
524-44-05-12

आज कलम कुछ रुकी रुकी सी है


कुछ रुकी रुकी सी है
भावनाएं भी ठहरी हुयी हैं
रुकावटें मुंह बायें खडी हैं
चिंताएं बढ़ी हुयी हैं
कुछ लिखूं
या चिंताएं दूर करूँ
झंझावत में फंसी हुयी है
इधर कुआ उधर खाई है
लिखूं नहीं तो मन
तडपेगा
लिखूं तो समय
लिखने में लगेगा
जब तक चिंताओं को
झेलना होगा
अब फैसला कर लिया
लिख कर तनाव दूर
करूंगा
चिंताओं का बोझ
हल्का करूंगा
फिर ठन्डे दिमाग से
सोचूंगा
चिंता मुक्त होने का
मार्ग निकालूँगा

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
14-05-2012
523-43-05-12