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शनिवार, 14 जुलाई 2012

आज कोई उनका लिखा नगमा सुना दे



आज कोई उनका लिखा

 नगमा सुना दे 
उनके करीब होने का
 अहसास करा दे 
ना करे फ़िक्र
सुर और साज़ की
ना ही लय ताल की
बस सुरीला नगमा सुना दे
उनकी कलम से निकले 
अल्फाजों से 
दिल को सुकून दे दे
एक एक लफ्ज़
दिल में बवंडर 
मचाएगा 
बीते वक़्त के 
समंदर में ले जाएगा
दिल मोहब्बत में 
फिर से डूब जाएगा 
अब वो नहीं इस जहाँ में
भूल जाएगा
जिस्म का एक एक रोम
मदहोश हो जाएगा
बहक कर नाचने लगेगा
खुद भी गाने लगेगा
वो नगमा 
जो उन्होंने लिखा था 
आज कोई उनका लिखा 
नगमा सुना दे

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
14-05-2012
522-42-05-12

खून जब बन जाता है पानी


बन जाता है पानी
मर्यादाएं
ध्वस्त हो जाती हैं 
संतान
दुश्मन बन जाती है
माँ बाप को 
प्रताड़ित करती है
धरती रोती है 
 आकाश रोता है
माँ बाप रोते हैं 
किस्मत को कोसते हैं 
क्यों जन्म दिया
ऐसी संतान को
निसंतान होने का दुःख
इतना भीषण तो
नहीं होता
खुद का खून जहर
बन कर
पल पल जान तो
नहीं लेता
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर   
14-05-2012
521-41-05-12

शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

सीधी सादी लडकी


सीधी सादी लडकी 
जिसके चेहरे पर
कभी सौन्दर्य प्रसाधन की
छाया भी नहीं देखी
सदा साधारण
कपड़ों में दिखती थी
आज घर के दरवाज़े पर
सौन्दर्य की प्रतिमूर्ती
बन कर खडी 
परी से लग रही थी  
जिज्ञासावश पूछ लिया
बन ठन कर आयी हो
आज कोई
विशेष बात है क्या
उसने मुस्काराते हुए
सर झुकाया
शर्माते हुए
धीरे से बोली
आज जीवन में
अवर्णनीय खुशी का
दिन है
बरसों से दबी इच्छा
आज पूरी होगी
आप से पहली बार
अकेले में
मुलाक़ात होगी
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
14-05-2012
520-40-05-12

गुरुवार, 12 जुलाई 2012

माँ पर कविता-माँ ही जननी,माँ ही पोषक


माँ ही जननी
माँ ही पोषक
माँ ही रक्षक
माँ पथ प्रदर्शक
माँ स्नेह सरिता है
माँ करूणा का सागर
माँ का आशीष
पारस मणी
माँ की गोद अनंत चैन
माँ के
समीप ह्रदय संतुष्ट
माँ का
वर्णन असंभव 
माँ तो केवल माँ है
ना हुआ उसके 
जैसा कभी
ना ही 
कोई होगा कभी
जिसने भी जान लिया
माँ का सत्य
उसका जीवन 
हो जाएगा तर
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
13-05-2012

519-39-05-12

सिसकियाँ


सदियों से उठ रही हैं
गरीब के दिल से
सिसकियाँ
पीढी दर पीढी
रुकी नहीं ये सिसकियाँ
दो जून रोटी के खातिर
चलती रहती हैं
सिसकियाँ
बचपन से बुढापे तक
बंद नहीं होती
सिसकियाँ
ज़िन्दगी का दूसरा नाम
हो गया सिसकियाँ
तारीख बदली
वक़्त बदला
रुकी नहीं सिसकियाँ
राजाओं ने देखा,
नवाबों ने देखा
करा कुछ भी नहीं
बंद करने के लिए
सिसकियाँ
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
13-05-2012

518-32-05-12

क्या कहूँ ज़माने को ?



क्या कहूँ ज़माने को ?
ज़माना तो
अपनी चाल चलेगा
उगते सूरज को
सलाम  करेगा
डूबते को अँधेरे में
धकेलेगा
हँसते के साथ हंसेगा
रोते को रुलाएगा
किसका हुआ है ज़माना
जो अब मेरा होगा
खुद को ही सहना
होगा
खुद को ही लड़ना
होगा
यूँ ही जीना होगा
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
12-05-2012
516-30-05-12

बुधवार, 11 जुलाई 2012

बरसों बाद जब मिला उनसे



बरसों बाद
जब मिला उनसे
ना उनके चेहरे पर
हँसी थी
ना मेरे चेहरे पर 
खुशी थी 
समझ नहीं आया
क्यूं फिर इतनी दूरी थी
क्या गलतफहमी थी
जब दोनों  
गम की नदिया में
 बह रहे थे
फिर क्यूं दो धाराएं थी
क्या वो भी यही 
सोचती होगी 
जो मैं सोचता हूँ
कब धाराएं मिल कर
एक होगी
कब फिर साथ बहेंगी 
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
12-05-2012
515-29-05-12

मंगलवार, 10 जुलाई 2012

क्यों समझते हो…



महरी के बेटे को
मोबाइल पर
बात करते देख
वो ऊंची आवाज़ में बोले
इतना महँगा फ़ोन
कहाँ से उठा कर लाये हो
लड़का पहले तो सहमा
फिर हिम्मत कर के बोला
अब सोच बदल दो
बिना सोचे समझे 
कहना छोड़ दो  
क्यों समझते हो
हर अमीर को साहूकार
हर गरीब को चोर
फ़ोन मेरा अपना नहीं
मेरे ऑफिस का है
मोबाइल कंपनी में
काम करता हूँ 
वहीं से मिला है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
12-05-2012
514-28-05-12

फलक के सितारे भी पूछते हैं मुझसे


फलक के 
सितारे भी
पूछते हैं मुझसे
तेरी खामोशी का
राज क्या है
ऐसा क्या किया मैंने
जो उल्फत से 
नवाज़ा तुमने
मेरी तरफ देख कर
मुस्कराना तक 
छोड़ दिया
कैसे बताऊँ उन्हें
मेरा कसूर सिर्फ
इतना था
तुमसे मोहब्बत का
इज़हार किया था
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
12-05-2012
513-27-05-12

सोमवार, 9 जुलाई 2012

कौन कहता है ऊंचे पहाड़ों पर घास के मैदान नहीं होते


कौन कहता है
ऊंचे पहाड़ों पर घास के
मैदान नहीं होते
ऊंचे लोग धरातल से
जुड़े नहीं होते
हुए हैं इस देश में नेता
गाँधी,सुभाष पटेल
जैसे भी
ना अहम् था,ना स्वार्थ था
ना ही खुद का ध्यान था
जीवित रहे जब तक
सोचते रहे देशवासियों के
भले के लिए
जिए जब तक जिए
देश और देशवासियों
के लिए
क्रतव्य की बलि वेदी पर
करी जान न्योछावर
देश और देशवासियों
के लिए

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
12-05-2012
512-26-05-12

लक्ष्य की और


कोई हाथ पकड़ता है
कोई पैर खींचता है
कोई बातों से विचलित
करने की कोशिश
तो कोई अवरोध खड़े
करता हैं
चारों तरफ से
मुझे पथ से डिगाने
का प्रयास होता रहा है
कभी विचलित भी होता हूँ
आपा खो देता हूँ
कभी लडखडाता हूँ
इश्वर में आस्था
अपने आप पर विश्वास
मुझे पथ से
डिगने नहीं देता
अवरोधों को पार करते हुए
लोगों के मंसूबे
पूरे नहीं होने देता
ना हार मानता हूँ
ना थकता हूँ
निराशा के चक्र व्यूह से
अपने को बचाते हुए
अविरल नदी सा बहता 
रहता हूँ
लक्ष्य की और
अग्रसर रहता हूँ
10-05-2012
511-26-05-12

रविवार, 8 जुलाई 2012

बेचैनियाँ इतनी मिली ज़िन्दगी में



बेचैनियाँ
इतनी मिली ज़िन्दगी में
सुकून
कभी मिल भी जाए
ज़िन्दगी के सफ़र में
पहचान नहीं पाऊंगा
अजनबी समझ
बगल से निकल जाऊंगा
इतना सताया मुझे
ज़िन्दगी में सुकून ने
पहचान भी लूं
तो दोस्ती नहीं करूंगा
बेचैनियों से बेवफ़ाई भी
नहीं करूंगा
जिन्होंने ज़िन्दगी भर
साथ निभाया
11-05-2012
511-26-05-12

दिन के उजाले पर रात की स्याही कैसी



हँसते हुए चेहरे पर आज ये उदासी कैसी

महकाती थी ज़माने को खुशबू जिनकी
आज उन बहारों में ये खिजा की बू कैसी

दिल डूबता है देख कर ये खौफ का मंज़र
शहनाइयों के बीच ये मातमी धुन कैसी

नहीं आ रहा समझ मुस्कुराते लबों पर
आज खुले आम ग़मों की नुमाइश कैसी

ना दे खुदा किसी हसीं को किस्मत ऐसी
मंदिर में हो जाए कब्रिस्तान की खामोशी

मासूम पर खुदा की ये मेहरबानियाँ कैसी 
ना मिले किसी दुश्मन को भी सज़ा ऐसी
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
10-05-2012

510-25-05-12

भ्रूण ह्त्या पर कविता-मुझे जन्म तो लेने दो


मुझे जन्म तो लेने दो

संसार को देखने तो दो
वैसे ही बहुत कुछ
सहना होगा
लपलपाती नज़रों से
खुद को बचाना होगा
पुरुषों का तिरिस्कार
सहना होगा
हवस का शिकार
होना पडेगा
माँ ,बेटी ,पत्नी का
पात्र निभाना होगा
चूल्हे ,चक्की की
भट्टी में पिसना होगा
खुद से पहले दूसरों को
खिलाना होगा
अपने हाथों से पाप
मत करो
जन्म से पहले
मुझे मत मारो
इश्वर को
क्या जवाब दोगे
ये भी ध्यान कर लो
मुझे जन्म तो लेने दो
मुझे जन्म तो लेने दो
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
10-05-2012

509-24-05-12