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शनिवार, 7 जुलाई 2012

हमें तो पता नहीं भैया, तुम्हें पता हो तो बता दो




क्या होती है राजनीति ?
कैसे चलते हैं चालें?
हमें तो पता नहीं भैया
तुम्हें पता हो तो बता दो
कैसे करते हैं घोटाला ?
कैसे लेते हैं रिश्वत ?
हमें तो पता नहीं भैया
तुम्हें पता हो तो बता दो
कैसे करवाते हैं दंगे?
कैसे होती है हड़ताल ?
हमें तो पता नहीं भैया
तुम्हें पता हो तो बता दो
कैसे करते हैं झूठ को सच ?
कैसे करते हैं काले को सफ़ेद ?
हमें तो पता नहीं भैया
तुम्हें पता हो तो बता दो
कैसे रखते हैं बोरियों में पैसे ?
कैसे भेजते हैं विदेश?
हमें तो पता नहीं भैया
तुम्हें पता हो तो बता दो
क्यों करते हो दिमाग खराब ?
क्यों हम से पूछ रहे हो ?
पूछना है तो
किसी नेता से पूछ लो
वो ही करता है सब
वही बताएगा सच ?
10-05-2012
507-22-05-12

शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

आज किसी ने मुझे मेरे,बचपन के नाम से पुकारा ,

आज किसी ने  
बचपन के नाम से 

पुकारा मुझको
पीछे मुड कर देखा तो
एक बुजुर्ग सज्जन खड़े थे
मैंने कहा
पहचाना नहीं आपको
वो दुखी भाव से बोले
विश्वास नहीं होता
तुम इतना बदल जाओगे
तुम्हें स्कूल में पढाता था
मैं नहीं भूला तुमको
तुम कैसे भूल गए मुझको
क्या तुम भी ज़माने की
चाल चलने लगे हो
ऐसा तो कुछ नहीं
पढ़ाया था तुमको
मैं शर्म से गढ़ गया
तुरंत उन्हें प्रणाम किया
क्षमा मांगते हुए बोला
गुरूजी मैं तो पथ से
भटक गया था
पर बरसों बाद आपने
कैसे पहचान लिया
गुरूजी बोले
हर शिष्य को कलेजे का
टुकडा मानता रहा
अपना समझ पढ़ाता रहा
अब तुम्ही बताओ
कोई अपनों को
कैसे भूल सकता है
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
09-05-2012
505-20-05-12


मेरी आँखों ने जो देखा


ईमानदारी का 
केवल नाम है 
पैसा,
सत्ताताकत ही
सब कुछ है
लूट खसोट करना
भ्रष्ट होना सबसे 
उत्तम  है 
ना यह सत्य है
ना ही भावनाओं का
उबाल
ना मस्तिष्क की उपज
ना ही ह्रदय की आवाज़
ये केवल
मेरी आँखों ने जो देखा
मेरे कानों ने जो सुना
मेरे शहर में
फुटपाथ पर लेटे
भूख से मर रहे
एक गरीब असहाय ने
आंसू बहाते हुए 
जो कहा
उसका वर्णन है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
08-05-2012
504-19-05-12

हास्य कविता- आशिक था बेचारा इश्क का मारा




आशिक था बेचारा
इश्क का मारा
समझता था खुद को
शाहरुख का साला
चेहरा था मासूम
हाथ अगरबत्ती
पैर मोमबत्ती
वज़न बीस किलो
पकड़ कर नहीं रखो तो
तेज़ हवा में उड़ जाए
कोई ऊंगली लगा दे
तो ज़ख़्मी हो जाए
गुस्सा इतना
कि आग भी शरमाए
जुबान गालियों से भरी
एक कन्या नज़र आयी
तो सीटी बजायी
फिर घूर कर देखने लगा
आशिकी
अंदाज़ में फिकरा कसा
चलती क्या खंडाला
कन्या ने पहले पुचकारा
फिर फुफकार कर बोली
पहले हाथ पैर सम्हाल
फिर हो जा नौ दो ग्यारह
नहीं तो बजाऊँगी बारह
आशिक था अकडा हुआ
अमचूर
जवाब में गाली बक दी
कन्या ने भी गाल पर
थप्पड़ जड़ दिया
आशिक बेचारा
चार फुट दूर उछल गया
बुक्का फाड़ कर रोने लगा
सारी हेकड़ी निकल गयी
कहने लगा बहना
मज़ाक कर रहा था
कन्या बोली
मैं नहीं कर रही थी
जब भी
मज़ाक का मन करे
मुझे बता देना
किसी कन्या को
छेड़ने से पहले
थोड़ी सेहत बना ले
रोज़ एक बादाम खा ले
आधा पाँव दूध पीले 
अब जा कर आराम कर ले
माँ की गोद में सो ले
06-05-2012
503-18-05-12

गुरुवार, 5 जुलाई 2012

मैं इतना जाहिल तो नहीं


मैं इतना 
जाहिल तो नहीं
ख़ूबसूरती को नहीं
पहचानूँ
तुम्हें देख कर आहें
ना भरूँ
इतना तंगदिल भी नहीं
तुम मुस्कराओं
मैं तारीफ़ ना करूँ
इतना खुदगर्ज़ भी नहीं
तुम जवाब ना दो
मैं बुरा मान लूँ
अब तुम्ही बताओ
गर दिल लगाया तुमसे
तो क्या गुनाह किया
या तो तुम खुद को
खूबसूरत नहीं मानती
या फिर तुम्हारी
मुस्काराहट
इस लायक नहीं
कोई
 उसकी तारीफ़ करें
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
06-05-2012

502-17-05-12

बुधवार, 4 जुलाई 2012

तन्हाइयों का चक्रव्यूह


तुम से
मिला तो नहीं
सिर्फ दूर से देखा था 
दिल तुम को
एक नज़र में दे दिया था
तुम कैसे समझोगी
मेरी तन्हाइयों की
कहानी
उन्हें समझने के लिए
तुमको भी तन्हायी
चाहिए
मगर मैं चाहता नहीं हूँ
तुम भी वही भुगतो
जो मैंने भुगता है
मैं तो निकल गया
तन्हाइयों से
तुम्हें याद कर कर के
तुम्हारे पास तो
मेरी यादें भी नहीं है
फिर कैसे निकलोगे
तन्हाइयों से
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
06-05-2012

501-16-05-12

कुंठा की अभिव्यक्ती


तुम कहते हो
भावनाओं को ना दर्शाऊँ
आंसू ना बहाऊँ
खामोशी से सहता रहूँ
तो,क्या दुखों को पीता रहूँ
मन ही मन घुटता रहूँ
बोझ तले दब जाऊँ
इतना भीतर भर लूं
कभी उठना चाहूँ 
उठ ही ना पाऊँ
जानता हूँ तुम इसे 
निराशा पूर्ण बात कहोगे 
यह सत्य नहीं है
अगर मन की कुंठाओं को
बाहर नहीं निकालूँगा
निश्चित रूप से
निराश हो जाऊंगा
अन्धकार में चले जाऊंगा
उजाले में रह कर ,
उजाले को मुखर बनाना है
तो कुंठा मुक्त होना होगा
तुम ही बताओ
कुंठा की अभिव्यक्ति
क्या कुंठा दूर करने का
उपाय नहीं है ?
प्रश्न उठा कर ही तुमने
मेरे अन्दर एक नयी
कुंठा को जन्म दे दिया
पल पोस कर
विकराल रूप लेने से
पहले ही उसे तत्काल
अभिव्यक्ती कर जड़ से
काटना आवश्यक है
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 06-05-2012
500-15-05-12

मंगलवार, 3 जुलाई 2012

उगते सूर्य का उजाला



उजाला समझा था
कुछ पलों के लिए
तुमने
उसमें नहलाया भी था
मन इतना उजला हो गया
जिधर देखता उधर
उजाला ही दिखता था
प्रतीत होने लगा
संतुष्टी का क्षितिज
समीप है
कब उजाला लुप्त हुआ
शाम का धुंधलका आया
पता ही नहीं चला
आगे केवल
काला अन्धेरा था
तुम्हारी संवेदन हीनता
मेरे जीवन से चुपचाप
निकल जाना
मेरे लिए ना सह सकने
वाला आघात था
मैं तो तुमसे बहुत दूर
पहुँच गया हूँ
पर तुमसे विनती है
किसी और को
उजाला दिखा कर मत
भरमाना
उसे अँधेरे में मत
धकेलना
नहीं तो संसार में
कोई किसी पर विश्वास
नहीं करेगा
प्रेम का नाम ही लुप्त
जाएगा 
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
06-05-2012

499-14-05-12

सोमवार, 2 जुलाई 2012

धूप छाँव



कई दिन बाद
वो हँस कर बोले
उनकी हँसी
कितनी देर रहेगी
कब मुंह लटका कर
बैठ जायेंगे
आंसू बहाने लगेंगे 
 डर से उनके साथ
हँस नहीं सका
उनका धूप छाँव सा
हँसना रुलाना
अब सह नहीं पाता
हँसना चाहूँ उससे
पहले ही रोना पड़ता
पर उनका मोह मुझे
उनसे दूर भी नहीं होने देता
गलती उनकी नहीं है ,
इसलिए सह रहा हूँ
लोगों ने
 इतना रुलाया उनको
हँसना ही भूल गए थे
रोना,रुलाना,
जीने का तरीका बन गया
बहुत समझाने के बाद
कभी कभी हँसने तो लगे हैं
जिस दिन निराशा से
मुक्त हो जायेंगे
हँसना उनके जीवन का
तरीका बन जाएगा 
मैं भी मन से
उस दिन ही हँस 
पाऊंगा
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
05-05-2012

498-13-05-12

कैसे कहूँ कभी हम उनके थे



कैसे कहूँ
कभी हम उनके थे?
हम सफ़र 
हम निवाले थे
उनके प्यार में मदहोश थे
समझते थे
ताजिंदगी चिपके रहेंगे
उनके दिल से
होश में आये तब तक
वो मिला चुके थे 
दिल हमारे रकीब से
उतार दिया
हमें दिल से वैसे ही
जैसे नयी बिंदी 
लगाने के लिए
माथे से पुरानी 
बिंदी उतारते थे
कैसे कहूं हम कभी
उनके थे
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
04-05-2012

497-12-05-12

रविवार, 1 जुलाई 2012

तुम्हें याद करना.....ना तो मेरी आदत ना ही मजबूरी


तुम्हें याद करना
ना तो मेरी आदत
ना ही मजबूरी
वो जीने के लिए
आवश्यकता मेरी
ह्रदय को
धड़कने के लिए रक्त
साँस के लिए हवा
मन को
जीवित रखने के लिए
तुम्हें याद करना
सपनों में देखना
मेरे लिए आवश्यक है
ह्रदय धडक भी ले
साँस भी आ रही हो
अगर मन निर्जीव हो
तो मैं जीवित कैसे हो
सकता हूँ
फिर खुद को जीवित
रखने के लिए
अगर तुम्हें याद 
करता हूँ
सपने में देखता हूँ
तो क्या अनुचित 
करता हूँ
तुम्हें तो प्रसन्न होना
चाहिए
बिना साथ होते हुए भी
मेरे जीवन की कारक हो
बिना तुम्हारी यादों के
मेरा अस्तित्व ही
नहीं है

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
04-05-2012

495-10-05-12