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शनिवार, 30 जून 2012

व्यंग्य-हमने मुस्कराकर बात क्या कर ली



हमने मुस्कराकर 
बात क्या कर ली  
उन्हें लगा हम उनसे
प्यार जता रहे हैं
नाराज़ हो कर
कहने लगे
अपनी उम्र देखिये
ना जान ना पहचान
मीठी बातें क्यूं कर रहे हैं ?
हमने जवाब दिया
हमें पता नहीं था
अपनों से छोटों से
मीठी बात नहीं
करनी चाहिए
मानता हूँ
भेड की खाल में
भेड़िये भी होते हैं
फिर भी एक सलाह
आपको भी देते हैं
अपना सोच बदलिए
उम्र में
छोटा हो या बड़ा
हर मुस्काराकर
मीठी बात करने वाले को
आशिक नहीं समझना
चाहिए
कभी उसमें
पिता और भाई भी
ढूंढना चाहिए
02-05-2012
493-08-05-12

शुक्रवार, 29 जून 2012

सृजन और विध्वंस

मिट्टी का भाग्य 
अच्छी या खराब
निर्भर करेगा उस पर
जिसके के हाथों में
मिट्टी जायेगी 
जिसकी जैसी नियत
वो वैसा ही करेगा 
एक बनाएगा 
भगवान् की मूरत
मंदिर में सजाएगा
खूब नाचेगा गायेगा
आनंद मनायेगा
दूसरा मूरत को
मिट्टी में मिलाएगा
फिर धूल उडाएगा 
अहम् भरा
अट्टाहास करेगा
भूल जाता है 
एक दिन खुद भी
मिट्टी में मिल जाएगा
एक सृजन में 
दूसरा विध्वंस में
विश्वास रखता 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
02-05-2012


                    492-07-05-12

झूठ का आवरण


किसी ने तुम्हारे प्रशंसा में
दो मीठे शब्द बोल दिए ,
तुम पचा नहीं पाए
फूल कर कुप्पा गए
बिना यह सोचे समझे
कहने वाले का मंतव्य क्या था
क्या वाकई तुम उन शब्दों के
लायक हो भी या नहीं
बदले में तुम कहने वाले को
समझदार इंसान बताने लगे
उसकी प्रशंसा में कसीदे पढने लगे
जब उसी ने एक  दिन तुम्हें
आइना दिखा दिया,
तुम्हारा कटु सत्य बता दिया
तुम नाराज़ हो गए
उसे भला बुरा कहने लगे
उसे नज़रों से गिरा दिया
सब से उसकी बुराई करने लगे
क्या कभी सोचा तुमने
तुम्हें सत्य अच्छा नहीं लगता
झूठ का आवरण तुम्हें भाता हैं
तुम चाहते हो दूसरे भी
ऐसे आवरण में
खुद को छिपा कर रखें
अब आत्मअन्वेषण कर लो
तुम कैसे इंसान हो
अगर फिर भी तुम्हें
अपने आप पर
ग्लानी नहीं होती
तो मेरी नज़रों में
तुम एक सच्चे इंसान नहीं हो
तुम्हें झूठ की दुनिया
पसंद है
यह भी ध्यान रखो
झूठ कभी छुपा नहीं रहता
अब तुम ही बताओ 
तुम पर कैसे 
विश्वास किया जाए?   
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
02-05-2012
491-06-05-12

गुरुवार, 28 जून 2012

क्रोध पर कविता -मैं नहीं कहता तुम मेरी मानो


मैं नहीं कहता तुम
मेरी मानो
ध्यान से सुन तो लो
प्रतीत होता है
तुम्हें क्रोध बहुत आता है
आवेश में
जो नहीं कहना चाहिए
वो भी कह देते हो
एक बार गहनता से सोचो
तुम ऐसा करते हो या नहीं
आत्म मंथन करो ,
उत्तर मिल जाएगा
यही बात अगर 
कोई दूसरा तुम्हें कहे
कबकहाँ कहेगा?,पता नहीं
स्थितियों,परिस्थितियों का
ध्यान नहीं रखेगा
क्या तुम्हें अच्छा लगेगा ?
हो सकता है
व्यक्तियों के समूह में
तुम्हारा मखौल उड़ाया जाए
व्यक्तिगत 
संबंधों में दरार पड़ जाए
बात झगडे तक बढ़ जाए 
क्यों नहीं खुद इस बात को
समझ लो
एक बड़ी विपत्ती को
छोटे से सुधार से बचा लो
समय रहते क्रोध पर
काबू कर लो
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
02-05-2012
490-05-05-12

पिंजरा



मैं खुद के बनाए
पिंजरे में 
बंद पंछी सा हूँ
जो पिंजरे की
जालियों के पार
देख तो सकता है
पिंजरे के
नियम कायदों से
मन में छटपटाहट
भी होती है
कई बार खुद को बेबस
महसूस करता हूँ
स्वछन्द उड़ना चाहता हूँ 
पर पिंजरे से
इतना मोह हो गया
कोई दरवाज़ा खोल भी दे
तो चाह कर भी
उड़ नहीं पाऊंगा

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
30-04-2012
485-66-04-12

आज वो नज़र आ गए



आज वो
नज़र आ गए
यादों के बाँध के
दरवाज़े खुल गए
कल कल करता
टूटे रिश्तों का पानी
धड धडा कर बहने लगा
कैसे रिश्तों की
ज़मीन में दरार पडी
अहम् ने खाई में बदल दी
किनारे इतने दूर हो गए
चाह कर भी फिर मिल
नहीं सके
साथ बिताए समय का
एक एक द्रश्य आँखों के
सामने से गुजरने लगा
ह्रदय पीड़ा से भरने लगा
आँखों से
अश्रु निकलने ही वाले थे
मैंने मन को कठोर किया
फिर ह्रदय से प्रश्न किया
क्यों फिर से
चक्रव्यूह में फसना
चाहती हो
पहले जो भुगता
क्या वो कम नहीं था
भूल जाओ
जो छूट  गया उसे छूट
जाने दो
आगे बढ़ो 
कुछ नया करो
कोई नया साथ ढूंढों
दिल से दिल
मन से मन मिलाओ
अहम् को ताक में रखो
जो पहले करा अब
ना करना
हँसते हुए सफ़र पर
चल पड़ो
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
30-04-2012
484-65-04-12

बुधवार, 27 जून 2012

क्यूं पहचानेगा कोई मुझे अब मेरे शहर में




कोई मुझे
अब मेरे शहर में
हो गया अनजाना अब
अपने ही शहर में
सोने चांदी से
भर गयी झोलियाँ सबकी
बन गए मकाँ बड़े बड़े
सीख गए चालें ज़माने की
अपनों को लात मार कर
आगे बढ़ने का हूनर भी
आ गया
मैं ईमान-ओ-दोस्ती के
गुमाँ में
वही खडा रह गया
नहीं कर सका बराबरी
उनकी
उनसे पीछे रह गया
क्यूं पहचानेगा कोई
मुझे अब मेरे शहर में
29-04-2012
483-64-04-12

जी का वन ही तो जीवन है



जीवन के
सृजन कर्ता से
पूछा मैंने एक दिन
क्यों आपने संसार में
सांस लेने वालों का नाम
जीव रखा
वो मुस्कारा कर बोला
जी का वन ही तो जीवन है
जिसमें सुन्दर पेड़ हैं तो
कंटीली झाड़ियाँ भी
इंसान हैं तो
हिंसक जानवर भी
कल कल करते झरने हैं तो
गंदे पानी से भरे गड्डे भी
नर्म घास के मैदान हैं तो
पथरीले रास्ते भी
मारने वाले हैं तो
बचाने वाले भी
क्या नहीं है
जी के इस वन में
यह सोच मैंने
सांस लेने वालों का
नाम जीव
सांस जब तक चले
तब तक जीवन के
नाम से
संबोधित किया

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
28-04-2012
481-62-04-12