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शनिवार, 23 जून 2012

धरोहर-काव्यात्मक लघु कथा डा.राजेंद्र तेला,निरंतर



धरोहर
(काव्यात्मक लघु कथा ) 
वो चार आने का सिक्का
उसने सम्हाल कर रखा है
जो माँ ने मरने से
एक दिन पहले

खर्चने के लिए दिया था
बड़े उल्लास से सिक्का लेकर
मेले में पहुंचा था
पहली बार अकेले

किसी मेले में गया था ,
घंटों घूमता रहा पर

तय नहीं कर सका
कैसे खर्च करे,कुछ खाए
या कुछ खरीद कर

घर ले जाए ,
मन मचलता

फिर ध्यान आता ,
कहीं ऐसा ना हो,

कुछ अच्छा छूट जाए
इसी ऊहापोह में घंटों

घूमता रहा
चार आने का सिक्का भी
उससे खर्च नहीं हो सका था 
घर पहुँच माँ ने पूछा ,
सिक्के का क्या किया ?
उसने झूठ कह दिया
चाट पकोड़ी में खर्च

कर दिया
अगले दिन ही
माँ की तबियत खराब

हो गयी 
फिर माँ कभी ठीक

नहीं हुयी
सदा के लिए

संसार से चली गयी
कई दिन तक उसे माँ से
झूठ बोलने का

और चार आने
खर्च नहीं कर पाने का

मलाल रहा
पर अब बुढापा आ गया
जब भी माँ की याद आती
तिजोरी से

सिक्का निकाल कर
घंटों उसे देखता रहता
शायद सिक्के में

उसे माँ की सूरत
दिखती है
सोच कर खुशी होती है
कितना अच्छा हुआ
जो उस दिन उसने
चार आने खर्च नहीं किये
वो चार आने का सिक्का
अब उसके लिए 
माँ की सबसे कीमती 
धरोहर है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

27-04-2012
470-51-04-12

शुक्रवार, 22 जून 2012

नींद मानो रूठ कर बैठ गयी



रात
नींद को बुलाता रहा
करवटें बदलता रहा
पर  नींद मानो 
रूठ कर बैठ गयी ,
बहुत
कशमकश और मिन्नतों के
बाद भी नहीं आयी
जब आयी तो
मुझे पता ही नहीं चला
कब आयी,
शायद थक हार कर
आँखें अपने आप
बंद हो गयी
नींद की गोद में जाते ही
मैंने उससे
नाराजगी का कारण पूछा
तो कहने लगी
तुम मुझे ढंग से बुलाते कहाँ हो
बिस्तर पर लेटते ही
कभी टीवी देखते हो
कभी विचारों में मग्न
हो जाते हो
दिन में क्या हुआ ?
किसने क्या करा,कहा ,
कल क्या करना है
पुरानी बातें याद कर के
व्यथित होते रहते हो
बेहद थके होते हो
जब अवश्य ऐसा नहीं होता
अब तुम्ही बताओ
मैं आ कर भी क्या करूँ
मन की उद्वेलित अवस्था में
आ भी जाऊं तो ,
तुम रात भर सपने में भी
वही सब करोगे
मुझे बुलाना हो तो
विचारों का मंथन त्याग कर
शांत मन और मष्तिष्क से
बुलाओ
परमात्मा का ध्यान करो
मैं तुरंत आकर तुम्हें
अपने गोद में ले लूंगी
हाँ ,अस्वस्थता में
अवश्य स्वयं पर वश
नहीं रहता


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
20-04-2012
469-50-04-12

हास्य कविता -पहली बार जब मिला उससे


पहली बार
जब मिला उससे
झिझक रहा था
दिल घबरा रहा था
उसने घबराहट को
पहचान लिया 
फ़ौरन बोली
तुम्हारा कोई दोस्त
इस तरह नहीं 
घबराया
बेफिक्र वक़्त बिताया 
तुम क्यों घबरा
रहे हो
डा.राजेंद्र तेला निरंतर 
20-04-2012
468-49-04-12

दिल की राख


किसने कहा

उनकी बेरुखी  से

हमारा  दिल टूट गया

दिल तो तभी  जल कर

ख़ाक हो चुका था

जब उन्होंने  हम पर

बेवफाई का

इलज़ाम लगाया था

अब जो आवाज़

तुमने सुनी

वो उस मर्तबान के

टूटने की थी

जिसमें हमारे

जले हुए दिल की

राख रखी थी
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
20-04-2012

467-48-04-12

गुरुवार, 21 जून 2012

मेरे ह्रदय के रक्त का रंग कैसा है


जानना चाहता था
मेरे ह्रदय के
रक्त का रंग कैसा है
छुरी हाथ में लेकर
उसे चीर दिया
देखा तो पाया
रक्त आधा लाल आधा
काला था
समझ गया काला रक्त
घ्रणा,इर्ष्या द्वेष से
रोग ग्रस्त है
लाल रक्त
ईमान,प्यार,स्नेह का है
मैं खुश भी हुआ
दुखी भी हुआ
क्यों पूरा
रक्त लाल ना था
आत्म मंथन किया
तो सत्य जान गया
अब निश्चय कर लिया
रोगग्रस्त रक्त को भी
लाल करना है
इर्ष्या,द्वेष,घ्रणा से
मुक्त होना है
स्नेह व प्यार से जीना है
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
20-04-2012
466-47-04-12

उसकी खुशबू



उसकी खुशबू में
मदहोशी की तासीर हैं
जितनी सून्घूं उतनी
कम है
डर लगता है
मेरी साँसों को इतनी
आदत पड़ गयी उसकी
उसके जाने बाद
बिना उसकी खुशबू के
सांस कैसे लूंगा

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
20-04-2012
465-46-04-12

मन की कशमकश

सोचता रह जाता हूँ
मन की कशमकश
कह नहीं पाता
तुम भी सोचती रहती हो
कह नहीं पाती हो
हमारी खामोशी
बीच की दूरियां बढ़ा रही है
ना कहने की मजबूरियां
एक बड़े तूफ़ान का
साधन बन रही हैं
क्यों इस तरह भटक कर
स्थिति को
विस्फोटक बनाएं
ना जुड़ने वाले
रिश्ते की नीव रखें
क्यों ना थोड़ा सा
मैं आगे बढूँ
थोड़ा सा तुम आगे बढ़ो
अपनी कुंठाओं के
बाँध को तोड़ दें
एक दूसरे के प्रति पल रहे
अविश्वास के बादलों को
खुल कर बरसने दें
फिर से विश्वास
और प्रेम के
मार्ग पर चलने का
प्रयत्न करें
मन मष्तिष्क से
अहम्  के
बोझ को उतार फेंकें
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
                                 20-04-2012
                                       464-45-04-12

बुधवार, 20 जून 2012

खूबसूरत आवरण





किताबों की दूकान में घुसते ही
शो केस में लगी रंग बिरंगे
खूबसूरत आवरण वाली
पुस्तक पर नज़र अटक गयी
जब आवरण इतना खूबसूरत
किताब भी बहुत सुन्दर होगी
कई दिनों बाद
अच्छा साहित्य पढने की
इच्छा पूरी होगी
शो केस के पास जाकर देखा 
नाम चीन लेखक द्वारा लिखी हुयी थी
कीमत भी बहुत अधिक थी
दूकान के मालिक से पूछा
किताब कैसी है
कहने लगा बहुत बिक रही है
किताब की कीमत चुकाई
घर पहुँचते ही पुस्तक 
पढ़ना प्रारम्भ किया
कुछ फ्रष्ठ पढने के बाद भी
समझ नहीं आया लेखक
क्या कहना चाह रहा  है
अंत में थक हार कर
किताब को उठा कर रख दिया
सिर में दर्द होने लगा था
तभी एक बुजुर्ग मित्र ने 
घर में प्रवेश किया 
सिर पकडे देख कारण पूछा
सब सुनने के बाद कहने लगे
सुन्दर आवरण में लिपटी
हर वस्तु वास्तव में सुन्दर हो
यह आवश्यक नहीं
नाम चीन व्यक्ति का 
हर कार्य प्रेरणास्पद नहीं होता
रही बिकने की की बात
तो ध्यान रखना
हर अधिक बिकने वाली चीज़
गुणवत्ता में सर्वोत्तम नहीं होती
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

                                     19-04-2012
                                         463-44-04-12

मंगलवार, 19 जून 2012

तुम्हें रोज़ याद कर लेता हूँ



चढ़ाता है फूल
जलाता है बाती
भगवान् के मंदिर में
करता है दुआएं
माँगता है कृपा उसकी
किसे दे किसे ना दे
सब उसकी
इच्छा पर निर्भर
भक्त का काम
निरंतर उसका नमन
यही सोच तुम्हें रोज़
याद कर लेता हूँ
कब होगी
तुम्हारी कृपा मुझ पर
इंतज़ार में रोज़
तुम्हें ख़त लिख देता हूँ
जिस दिन
मिल जाएगा उत्तर
तुमसे पा लिया प्रसाद
उस दिन तुम्हारी
कृपा समझ  लूंगा
19-04-2012
462-43-04-12