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शनिवार, 16 जून 2012

भीड़ के साथ भागता रहा


निरंतर दौड़ता रहा 
भीड़ के साथ भागता रहा 
मन में व्यथित होता रहा 
जीवन आनंद ना ले सका
 धन वैभव को
सब कुछ समझता रहा 
कितना सही कितना गलत 
पता नहीं चला 
बहुत देर बाद समझ आया 
क्यूं तय नहीं किया
 ज़िन्दगी का सफ़र 
अहिस्ता अहिस्ता 
क्यूं नहीं संतुष्टी को 
मकसद बनाया जीने का 
क्यूं मरीचिका के पीछे
भागता रहा 
जितना भी बचा है
जीवन अब संतुष्ट हो कर
जीना है
जितना आवश्यक
उतने की तमन्ना रखना है 
अब तय कर लिया
खुशी से जीना है
खुशी से जाना है
18-04-2012
456-37-04-12

एक एक ईंट जोड़ कर बनाया था जो मकान मैंने




एक एक ईंट जोड़ कर
बनाया था जो मकान मैंने
बिना अपनों के
अब मुझे ही काटने को
दौड़ता है
जिसमें देखा था एक
सुखी परिवार के साथ
रहने का सपना
अब एक कैदखाने
सा लगता है
उसके बगीचे के फूलों में
महक नहीं  है 
तितलियाँ घर में
झांकती तक नहीं हैं 
वीरान जंगल में स्थित
उस मंदिर की तरह
जिसमें सब कुछ है
पर पूजने के लिए
कोई मूरत नहीं है
जहां दर्शन के लिए
कोई नहीं झांकता ,
है तो केवल
मेरे जैसा ही एक पुजारी
जो आशा से सामने
सड़क को देखता रहता
कभी कोई आयेगा
मंदिर में मूरत सजाएगा
दर्शानार्थी आने लगेंगे
घंटे बजने लगेंगे
फूल चढ़ने लगेंगे
पूरा मंदिर महकने लगेगा
परमात्मा का
बसेरा दिखेगा
ठीक उसी तरह मैं भी
आशा में जीवित हूँ
कभी मेरा भी घर बसेगा
परिवार बढेगा
बच्चों की किलकारियों से
घर गूंजेगा
बगीचे के फूलों पर
तितलियाँ मंडरायेंगी
मुझे लगेगा ईंटों में
जब तक ऐसा नहीं होता
मकान किसी वीरान
कैदखाने से
कम नहीं लगेगा
17-04-2012
453-34-04-12

शुक्रवार, 15 जून 2012

वक़्त गुजार रहे थे



वो ख्वाइशों के शज़र
लगाते रहे
हम निरंतर धन दौलत के
पानी से उन्हें सींचते रहे
वो फिर भी शिकायत
करते रहे
हमसे रुसवाई की धमकी
देते रहे
परेशाँ हो कर हमने खुद ही
मोहब्बत से
रिहा होने का फैसला
सुना दिया
बड़ी शिद्दत से
खुश हो कर वो कहने लगे
कौन कमबख्त
मोहब्बत करता था तुमसे
जाने से पहले
हमारी कामयाबी पर
मुबारकबाद देते जाना
हम तो खुद पीछा
छुडाने की
कोशिश कर रहे थे
जब तक
जुदा ना हो जाओ हमसे
तब तक
वक़्त गुजार रहे थे
17-04-2012
453-33-04-12
शज़र=पेड़ 

दर्द को बुलावा ना दो




ज़ख्मों को कुरेद कर
दर्द को बुलावा ना दो
मुस्काराते चेहरों को
दिल का चारागार ना
समझो
वो कातिल-ऐ-दिल होते हैं
पहले भी खाई है चोट तुमने
कई बार देखे हैं
उनकी बेवफायी के जलवे
अब छोड़ दो
मोहब्बत का इरादा
ज़ख्मों को फिर हरा
ना होने दो
इस बार जो फँस गए
उनके जाल में
वफ़ा की उम्मीद में
कहीं जाँ से हाथ ना
धो बैठो
17-04-2012
452-32-04-12

ये दिल तेरे लिए धडकता क्यूं है ?



ये दिल तेरे लिए
धडकता क्यूं है ?
तेरे बिना तन्हाई का
आलम क्यूं है ?
दिन के उजाले में
अन्धेरा क्यूं है ?
मेरे सवाल का
जवाब दे दो
या फिर दिल की
महफ़िल सज़ा दो
ऐसे सताने का हक
तुम्हें नहीं है
चाहने वालों को
दुत्कारना ठीक
नहीं है
न चाहो तो
मुस्कारा कर ना
कह दो
पर इस तरह
तडपा कर ना
मारो
17-04-2012
451-31-04-12

गुरुवार, 14 जून 2012

आज इतना हँसो



आज इतना हँसो
खुद हँसी तुमसे पूछे
तुम्हें हुआ क्या है ?
क्या बात हुयी ऐसी 
जो दिल इतना
 खुश है
क्यूं छिपा कर 
रखा है ?
मुझे भी बता दो
वो राज़ क्या है
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
17-04-2012
450-30-04-12
हँसना, हँसी, शायरी,,selected 

सपनों की तलाश



सुन्दर
सपनों की तलाश में
रात भर आँख बंद
कर बैठा रहा
भोर हो गयी
आस पूरी ना हुयी
बसंत 
बिना बहार के
उम्मीद के बादल
बिना बरसे गुजर गए
ना ख्यालों को
मुकाम मिला
ना दिल की प्यास
बुझी
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
17-04-2012
449-29-04-12

न हाँ कहते थे ,न ना कहते थे



न हाँ कहते थे
न ना कहते थे 
निरंतर मिलते भी थे
मगर खामोश रहते थे
कब आयेगा
बेकरारी को करार
इंतज़ार में
दिल की धडकनें भी
थकने लगी 
बरसों बाद एक दिन
जुबां खोली
मिलते तो रहते ही हैं
क्यूं न ऐसे ही
गुजार लें ज़िन्दगी
17-04-2012
448-28-04-12

बुधवार, 13 जून 2012

उसके रुसवा होना से.....



उसके
 रुसवा होना से
ज़िंदा रहना दुश्वार
हो गया
किस उम्मीद से
घर के दरवाज़े पर
खडा होऊँ ?
अब तो घर के
 सामने से भी
कोई गुज़रता नहीं
 दिल के आँगन जैसे
मेरे घर की गली भी
सुनसान हो गयी
दिल टूट कर बिखर
ना जाए कहीं
वक़्त से पहले ही
तन्हायी जान ना ले ले
अब शहर से ही
 रुखसत लेनी होगी
उम्मीदों की नगरी
कहीं और बसानी
 होगी
17-04-2012
447-27-04-12

माँ की चिंता

(काव्यात्मक लघु कथा-माँ की चिंता)  

सर्दी की रात थी

घड़ी की सूइयां

बारह बजा रही थी

दोस्तों की महफ़िल सजी थी

माँ बेसब्री से

इंतज़ार करती होगी

जानते हुए भी

घर जाने की इच्छा ना हुयी

महफ़िल ख़त्म हुयी

घर पहुँच कर घंटी बजाई

माँ ने दरवाज़ा खोलने में

देर लगायी

देरी के लिए माँ को 

खरी खोटी सुनायी

माँ के चेहरे पर

शिकन नहीं आई

चुपचाप भोजन की

थाली लगायी

गर्म रोटी बना कर खिलायी

खाट पर जाकर लेट गयी

मुझे आवाज़ लगायी

एक दर्द की गोली दे दे

मुझे बात समझ नहीं आयी

माँ के सर पर हाथ रखा

सर बुखार से तप रहा था

मन ग्लानी से भर गया

अपने व्यवहार पर

क्रोध आने लगा

एक मैं हूँ जिसे

माँ की चिंता ही नहीं

दूसरी तरफ माँ है

जिसे मेरे सिवाय

किसी की चिंता नहीं

बरस बीत गए इस बात को

पर भूला नहीं हूँ

आज तक खुद को 

माफ़ नहीं कर पाया 

घटना को याद कर 

अब भी आँखें भीग जाती हैं

कितना भी प्रायश्चित कर लूं

ग्लानि कम नहीं होगी 

माँ की

बराबरी नहीं हो सकती 

माँ तो माँ होती

उसका सानी

ना कभी हुआ है कोई

ना हो सकता कोई कभी 

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  

17-04-2012

446-26-04-12

काव्यात्मक लघु कथा