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शुक्रवार, 8 जून 2012

आओ ज़िन्दगी के सांवले चेहरे को निखारा जाए


आओ ज़िन्दगी के
सांवले चेहरे को निखारा जाए
 अमावस की रात में
चाँद उगाया जाए
भूखे को रोटी
प्यासे को पाना पिलाया जाए
पड़ोसी के साथ मिल कर
हँसा जाए
ईमान को जीने का तरीका
बनाया जाए
अपनों को साथ रख कर
परायों को अपना बनाया जाए
अब इंसान बन कर जिया जाए
प्यार भाईचारे को
ज़िन्दगी का मकसद बनाया जाये
आओ ज़िन्दगी के
सांवले चेहरे को निखारा जाए 
16-04-2012
441-22-04-12

मैंने चाँद से पूछा,आकाश कितना बड़ा है



मैंने चाँद से पूछा
आकाश कितना बड़ा है
चाँद बोला पता नहीं
मैंने भी सूरज से पूछा था
उसने भी यही कहा
मुझे पता नहीं
नन्ही चिड़िया ने
वार्तालाप सुना
धीरे से बोली
मेरी भी सुन लो
मैं जीवन भर उडती रहूँ
तो भी पता नहीं चलेगा
आकाश कितना बड़ा है
इतना अवश्य पता है
जितना मेरे लिए आवश्यक
उससे तो बड़ा है
फिर क्यों जानने के लिए
खुद को परेशान करूँ
हर छोटी बड़ी बात की
चिंता करूँ
क्यों नहीं
जितना आवश्यक केवल
उसका ध्यान करूँ
कह कर चिड़िया
आकाश की ओर उड़ गयी
मुझे सोचने के लिए
बहुत कुछ दे गयी
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डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
16-04-2012
440-21-04-12

गुरुवार, 7 जून 2012

नए को जानने से पहले


जिन्हें कल जानता था
उनमें से कुछ याद रहे
कुछ को भूल गया
जिन्हें आज तक नहीं
जानता हूँ
उन्हें कल जानूंगा
उनमें से भी
कुछ याद रहेंगे
कुछ को भूल जाऊंगा
इस सिलसिले को
कैसे रोकूँ ?
क्यों न नए को
जानने से पहले
जिन्हें आज जानता हूँ
उन्हें सहेज कर रख लूं
कुछ ऐसा कर लूं
उन्हें कभी न भूलूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
16-04-2012
439-20-04-12

सच मान बैठे




उसने 
वादा किया था
कल  फिर आऊँगी
कई दिन
कई रातें गुजर गयी
आँखों की नींद अधूरी रही
दिल की
धड़कन बढ़ती गयी
निगाहें रास्ते पर गढ़ी रहीं
जब थक कर पूंछा
मैंने किसी से
कहीं देखा है तुमने उसको
हंस कर वो कहने लगा
कभी मुझ से भी
वादा कर के गयी थी
मुझ से भी बेवफायी
करी थी
फर्क इतना ही है
मैंने यकीन नहीं किया
तुम सच मान बैठे 
उसके वादे को
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
12-04-2012
438-19-04-12

बुधवार, 6 जून 2012

जब मेरी याद आये


जब मेरी याद आये
मुझे ख़त लिखना
ख़त में चाहे 
एक लफ्ज़ ना लिखना
पर उस पर मेरा पता
अपने हाथ से लिखना
तुम्हारी हाथों की लिखावट
देख कर ही खुश हो लूंगा
अब भी तुम्हारे पास
कुछ लम्हे बचे हैं मेरे लिए
जान कर सुकून से
जीता रहूँगा
दूर रहते हुए भी
तुम्हें अपने दिल के
करीब पाऊंगा
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
12-04-2012
437-18-04-12

भुगत रहा हूँ खामियाजा आज


बढ़ गया 
दिल का रंज-ओ-गम
जीना हो गया 
मुश्किल आज
जिसने खोला था 
दरवाज़ा जहन का
उसी ने लगा दिया 
ताला आज
रूबरू कराया था 
रोशनी से जिसने
उसी ने दिखाया 
अन्धेरा आज
शिकवा शिकायत नहीं 
उससे फिर भी
कुछ पल तो 
निभाया था 
उसने साथ
कसूर उसका 
फिर भी  नहीं 
मानता
मैंने ही किया होगा
 कुछ काम ऐसा
भुगत रहा हूँ 
खामियाजा आज
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
12-04-2012
437-17-04-12

मंगलवार, 5 जून 2012

हास्य कविता- कितना खुशगवार था वो लम्हा


हास्य कविता- कितना खुशगवार था वो लम्हा
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कितना खुशगवार था
वो लम्हा
जब उसने मुस्करा कर
मेरी तरफ देखा 
करीब आकर मेरा पता पूछा
दिल खुश हुआ
जब रंग बिरंगे कागज़ में
लिपटा एक तोहफा
हाथ में थमाया
दिल टूट कर बिखर गया
जब उसने
चहकते हुए कहा
आपके पड़ोस में रहने वाले
मेरे मंगेतर को भिजवा देना

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
12-04-2012
436-16-04-12

हंसने से पहले ही....


हँसने से पहले ही
रोना पड़ता
सर पर रखा हाथ ही
गला दबाने लगता
ठीक होने से पहले
चारागर ही ज़ख्म
फिर हरे कर देता
ज़िन्दगी में अब तक
कोई चारागर ना मिला
जो ज़ख्मों को ठीक कर दे
फिर भी हारा नहीं हूँ
तलाश करता रहूँगा
वक़्त काटता रहूँगा
12-04-2012
435-15-04-12
चारागर =चिकत्सक

अँधेरे में भी रोशनी निरंतर मेरे साथ रहती है


अँधेरे में भी रोशनी  निरंतर मेरे साथ रहती है
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 आज भी दिन भर
दिमाग में
कोई ना कोई उधेड़बुन
चलती रही
खुद से सवाल किया
क्या ज़िन्दगी
ऐसे ही चलती रहेगी ?
मन की आस फिर भी
टूटी नहीं
बिस्तर पर लेटते ही
आँखें बंद हो गयी 
जिनकी हर इच्छा पूरी
हो जाती
नींद की तलाश में
ज़िन्दगी भर भटकते रहते
अधिक पाने की इच्छा में
सो ना पाते
यही क्या कम बात है ?
मुझे इतनी आसानी से
नींद आ जाती
अँधेरे में भी रोशनी 
निरंतर मेरे साथ रहती है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
11-04-2012
434-14-04-12

सोमवार, 4 जून 2012

ज़िन्दगी ने हमें सताया बहुत


ज़िन्दगी ने
हमें सताया बहुत
हँसते हुए को रुलाया
बहुत
हमने भी उसे छकाया
बहुत
वो गिराने की कोशिश
करती रही
हमें लंगडी लगाती रही
हमने भी हार मानी नहीं
कभी लडखडाते
कभी गिर पड़ते
हर बार बार खड़े होते रहे
खुद को सम्हाल कर
आगे बढ़ते रहे
निरंतर हँसते रहे
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर     
11-04-2012
433-13-04-12

यादगार बन गया दिन सात अप्रैल का




यादगार बन गया
दिन सात अप्रैल का
कोई आया
बोस्टन,न्यू जर्सी से
तो कोई मुंबई,बंगलौर से
क्या पुत्र पुत्री
क्या साले,साली
क्या पोते नाती
सब के सब इकट्ठा हुए
अजमेर शरीफ में
माँ पिता के विवाह की
चौहतरवीं वर्षगाँठ पर
मिला परिवार पूरा
आये मित्र,रिश्तेदार भी सारे
सुनाये सबने किस्से
उनके साथ बिताये दिनों के
हो गए भाव विव्हल
याद कर
खट्टी मीठी बातों को
माँ ने नृत्य किया
पिता ने बताये सफल
वैवाहिक जीवन के राज़
खूब हँसे खूब नाचे गाये
इस सुनहरे अवसर पर
बिरले ही होते हैं
जिन्हें होते नसीब
जीवन में ऐसे अवसर
11-04-2012
432-12-04-12

हास्य कविता-सर्द रात में उल्लू बोला



कविता पाठ करना
प्रारम्भ किया
सर्द रात में उल्लू बोला
एक मनचले श्रोता ने
आवाज़ लगाई
आज गर्मी की शाम को
मंच से बोल रहा है
हँसमुखजी ने क्रोध
काबू में किया
नहले पर दहला मारा
आवाज़ सुनते ही
उल्लू का भाई
श्रोताओं के बीच से बोला
श्रोता ने चिढ कर सवाल किया
तुमने मुझे उल्लू कैसे कहा
हँसमुखजी बोले
गलती से तुम्हें उल्लू
कह दिया
तुम तो काले कव्वे हो
खामखाँ
कांव कांव कर रहे हो
कांव कांव करना बंद करो
मुझे कविता पाठ करने दो
11-04-2012
432-11-04-12