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शनिवार, 2 जून 2012

कुछ बातें .........



सदा अनकही रहती
कभी मुस्काराहट
कभी क्रोध दिलाती
किसी को बताऊँ
नहीं बताऊँ की दुविधा में
छाया बन कर साथ
चलती
दिखती नहीं
पर मन को झंझोड़ती
अन्दर ही अन्दर
छुप कर निरंतर घाव
हरे करती
जीवन पर्यंत साथ
निभाती
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  
11-04-2012
430-09-04-12

अच्छे के साथ




जन्म दिन पर
शिक्षक ने छात्र को 
गुलाब के फूलों से लदी
टहनी भेंट करी
छात्र बोला गुरूजी
टहनी काँटों से भरी है
हाथ में चुभ जाएंगे 
शिक्षक ने उत्तर दिया
चिंता मत  करो
टहनी को  काँटों से 
बचा कर पकड़ो
ध्यान रखो संसार में 
अच्छे के साथ
बुरा भी होता है
बुरे से बच कर रहो
अच्छे का साथ 
कभी मत छोडो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
अच्छा,बुरा,जीवन मन्त्र 
10-04-2012
429-08-04-12

ज़िन्दगी का खेल

दिल से जुड़ जाए दिल
तो दरिया दिल 
ना जुड़े तो तंग दिल
अरमान पूरे हो जाएँ  
तो हकीकत
पूरे  ना हो तो ख्वाब
हो जाए तो मुमकिन
न हो तो नामुमकिन
मिल जाए तो किस्मत
ना मिले तो बदकिस्मत

रोने वाला रोता रहेगा
हंसने वाला हंसता
रहेगा
ज़िन्दगी का खेल
यूँ ही चलता रहा है
यूँ ही चलता रहेगा
03-04-2012
428-07-04-12

शुक्रवार, 1 जून 2012

फैसला हो ना सका


फूल चमेली का
टहनी से जुदा किया
बालों में लगाऊँ
कई फूल जोड़ कर
गजरा बनाऊँ
सोचते सोचते 
वक़्त गुजर गया
फूल मुरझा गया 
इसे अपना बनाऊँ ?
उसे अपनाऊँ?
फैसला हो ना सका
सोचते सोचते
ना ये मिला ना वो मिला
कुंवारापन बोझ बन गया
बुढापा आ गया
जीना दुश्वार हो गया
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
03-04-2012
427-07-04-12

किसका क्या भरोसा



किसका क्या भरोसा
ज़नाज़े को कंधा लगाएगा 
या नहीं लगाएगा
मौत पर मुस्काराएगा 
या मातम मनाएगा
क्यूं ना
हकीकत को जान लूँ
उम्मीद की दुनिया से
बाहर निकल जाऊं
सबको खुश करने के लिए
चेहरे पर चेहरा चढ़ाना
छोड़ दूँ
जिसका भी दिल दुखेगा
वो आंसू बहाएगा
जो नफरत रखता है
वो मुस्काराएगा
02-04-2012
426-06-04-12

गुरुवार, 31 मई 2012

ये आवश्यक तो नहीं


ये आवश्यक तो नहीं
हर पेड़ पत्तों से भरा हो
हर पेड़ छाया प्रदान करे
हर पेड़ पर कली खिले
पुष्प बन कर सुगंध से
महके
क्या हम उस पेड़ को
काट देते ?
जिसमें एक भी खूबी
ना हो 
फिर क्यों सदा हम
हर इंसान में खूबियाँ
ढूंढते
इंसान को केवल
इंसान नहीं समझते
उसे अपनी निगाहों से
गिरा देते
इंसानियत को 
शर्मसार करते
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
02-04-2012
425-05-04-12

ये कैसी चाहत है ?



तुम कहते हो
हमें बहुत चाहते हो
हर पल याद करते हो
ये कैसी चाहत है ?
हमारे चेहरे पर
 दर्द की लकीरें
तुम ठहाके लगा 
रहे हो
हम चल भी नहीं 
सकते
तुम दौड़ लगाते हो
क्यों खामखाँ
दोस्ती का नाम
 बदनाम करते हो
इससे तो बेहतर था
तुम खुले आम हमें
दुश्मन कहते
दिल में झूठ बोलने का
बोझ तो नहीं ढोते
अपने ज़मीर से तो
इमानदारी करते


डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
02-04-2012
424-04-04-12

जो खो दिया था


बीमारी से झूझ रहा हूँ
दर्द से पीड़ित
शरीर का अंग अंग
आँखों से आंसू बहा रहा है
फिर भी मन खुश है 
बरसों से उनके लिए
समय नहीं था
काम का बहाना आड़े
आता रहा
अब पूरा दिन उनके
सानिध्य में बीत रहा है
उनका हाथ मेरे हाथ में है
जो खो दिया था
उसे फिर पा जो
लिया है
02-04-2012
423-03-04-12

नसीब की क़यामत


नसीब  की
क़यामत तो देखिये
हाथों की मेहंदी को
अश्कों ने धो दिया
चूड़ियों की खनक को
सिसकियों ने दबा दिया
अरमानों ने
कफ़न ओढ़ लिया
लाल चुनडी की जगह
सफ़ेद साड़ी नी ले ली
ना जाने खुदा ने
उससे किस गुनाह का
बदला लिया
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
   02-04-2012
422-02-04-12

बुधवार, 30 मई 2012

बिना अभिमन्यु बने चक्रव्यूह नहीं टूटेगा


कहीं खो गया हूँ 
खुद को भूल गया हूँ 
सब की सोचते सोचते 
खुद भटक गया हूँ 
आत्मविश्वास से डिग
गया हूँ 
निराशा के चक्रव्यूह में 
उलझ गया हूँ 
इतना अवश्य पता है 
बिना अभिमन्यु बने 
चक्रव्यूह नहीं टूटेगा
मेरे अन्दर के अर्जुन को 
ढूंढना होगा 
निराशा के चक्रव्यूह को 
कैसे तोडूँ ?
याद करना होगा 
अभिमन्यु सा 
चक्रव्यूह में नहीं उलझूं 
ये भी जानना होगा 
आत्मविश्वास पाना होगा 
पहले सा हँसते हुए
जीना होगा 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
01-04-2012
421-01-04-12

तुम लौट कर आओ ना आओ



तुम्हारी मर्जी 
लौट कर
 आओ ना आओ
लौट कर
आ भी जाओ तो
चेहरा,आँखें ,
आवाज़
तो वही मिलेगी
मगर तुम्हारे
इंतज़ार में 
 दिल टूट कर 
बिखर चुका
उसका जुड़ना 
मुश्किल होगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
शायरी, 
20-03-2012
420-154-03-12

मंगलवार, 29 मई 2012

शुक्रगुजार हूँ



शुक्रगुजार हूँ 
जो तुमने मुझे 
इतने ज़ख्म दिए
उन्हें देख कर
तुम्हें याद 
तो करता ही हूँ
अहसास भी करता हूँ
कोई अपना ही था
कोई दुश्मन होता 
तो बर्दाश्त नहीं करता
आपा खो देता
उचित जवाब दे देता
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
20-03-2012
418-152-03-12

कभी बहते पानी सा होता था


कभी बहते
पानी सा होता था
मस्ती में
डूबा रहता था
जब से तुम्हें देखा
तालाब के पानी सा
ठहर गया हूँ
तुम्हारे ख्यालों में 
खोया रहता हूँ 
हर लम्हा इंतज़ार
करता हूँ 
तालाब की दीवारें 
कब टूटेगी 
कब मोहब्बत की 
धारा में
तुम्हारे साथ बहायेगी 
तुम्हारी ज़िन्दगी के
समंदर में मिलाएगी  
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
20-03-2012
417-151-03-12

सोमवार, 28 मई 2012

थोड़ा तुम आगे बढ़ो,थोड़ा मैं आगे बढूँ



मैं रात में  देर से सोता
तुम कहती लाईट में
नींद नहीं होती
तुम भरती जोर के खर्राटे
नींद मेरी भी उडती
तुम पीती चाय ठंडी 
मुझे गर्म चाय अच्छी
लगती
मुझे पसंद मीठा
तुम्हें नमकीन पसंद
तुम्हें व्यायाम अच्छा
लगता
मुझे खेलना भाता
मैं पंखे बिना सो ना पाता
तुम्हें पंखे में जुखाम हो
जाता
मैं चलाता पंखा
तुम उसे बंद कर देती
मैं सुनता समाचार टी वी पर
तुम देखती सीरिअल
तुरंत चैनल बदल देती
बड़ी अजीब हालत है
किच किच ख़त्म नहीं होती
घर घर यही कहानी है
जो एक को पसंद
वो दूजे को नापसंद
क्या करें
या तो हर दिन
हर बात पर झगडें
या बीच का रास्ता निकालें
आओ अब अहम् को
छोड़ दें
थोड़ा तुम आगे बढ़ो
थोड़ा मैं आगे बढूँ
एक दूजे की पसंद का
ख्याल कर लें
थोड़ा तुम्हारी पसंद का
थोड़ी मेरी पसंद का कर लें
जितना भी साथ जीना
उतना खुशी से जी लें


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
20-03-2012
416-150-03-12

ज़िन्दगी की धूप में


ज़िन्दगी की धूप में
बाल तो सफ़ेद नहीं हुए
दिल सफ़ेद हो गया
सारा खून ज़माना
पी गया
छल कपट के सामने
कमज़ोर पड गया
मोहब्बत से
जीने वाला घबरा गया
पर उम्मीद अभी बाकी है
सांस भी चल रही हैं
जब तक रहेगी जान
में जान
हार नहीं मानूंगा
मोहब्बत के खातिर
लड़ता रहूँगा
20-03-2012
415-149-03-12

होली पर कविता -हर बरस आती होली

हर बरस आती होली

बस्ती बस्ती घूमती

मस्तों की टोली

लिए हाथ में चंग

बजाते ढोलक और डफली

चलाते रंग भरी पिचकारी

खूब होता नाच गाना

होती हँसी ठिठोली

ऋतू बसंत में

उड़ता अबीर गुलाल

सुबह गुलाबी हो जाती 

हर ह्रदय में सजती प्रेम

उमंग की होली

हिन्दू,मुस्लिम,सिख,इसाई

बच्चे बूढ़े और जवान

मिल जुल मनाते होली

हर बरस आती होली

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  

20-03-2012

414-148-03-12