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शुक्रवार, 25 मई 2012

कितनी अजीब बात है


कितनी अजीब बात है
बरसों बाद मिलने पर भी
उसकी निगाहें
मेरी तरफ नहीं उठी 
उसे मेरा चमकता 
चेहरा नहीं दिखा
आँखों में इंतज़ार को
मंजिल मिलते नहीं दिखा
ना ही उसे मेरे होठों पर
मुस्काराहट नज़र आयी
जिसके लिए रो रो कर
ज़िन्दगी गुजार दी
उसकी बेरुखी की वजह
समझ नहीं आयी
शायद मेरे सफ़ेद बाल
चेहरे की झुर्रियां
उसे पसंद नहीं आयी
उसे मोहब्बत दिल से नहीं
सूरत से थी
दिल से ज्यादा दिल्लगी
पसंद थी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
20-03-2012
411-145-03-12

कब जागेगी इच्छा ?

कब जागेगी इच्छा ?

कब कहेगा मन ? 
कब आयंगे भाव ?
कब चलेगी कलम ? 
पता नहीं चलता
जब भी चलती 
रुकती नहीं कलम
जोडती शब्दों को
उकेरती भावों को 
लेती आकार 
सृजन 
होता कविता का
तृप्त होता मन
मिलती संतुष्टी 
आत्मा को 
20-03-2012
410-144-03-12

हास्य कविता-हँसमुखजी ने नए पोज़ में फोटो खिचवाई



हँसमुखजी पर
फोटो खिचवाने का भूत सवार था 
दिन भर सपनों में खोये रहते थे
किस नए पोज़ में फोटो खिचवाएं
निरंतर सोचते रहते थे
एक दिन पहुँच गए किस्मत से
किसी की मय्यत में
दिमाग में विस्फोटक सोच आ गया
चेहरा खुशी से मुस्काराया
मरने वाले की बीबी से कहने लगे
अपने पती को थोड़ी देर के लिए
कहीं और लिटा दो
इनकी जगह मुझे लिटा दो
वादा करता हूँ फोटो खिचवा कर
तुरंत उठ जाऊंगा
आज तक किसी ने ज़िंदा आदमी को
अर्थी में लेटा हुआ नहीं देखा होगा
मेरी फोटो खिंचवाने के बाद
एक नया रिकोर्ड बन जाएगा 
मरने वाले की बीबी ने लिया
हाथ में डंडा
लगी मारने हँसमुखजी को
दे दनादन डंडे पर डंडा
चिल्ला कर क्रोध में फुफकारी 
लो अब खिचवाओ नए पोज़ में फोटो
इस पोज़  में आज से पहले 
नहीं खिचवाई होगी किसी ने
अपनी फोटो
19-03-2012
409-143-03-12

गुरुवार, 24 मई 2012

हास्य कविता-खिली धूप बरसात के बाद-(मित्रता समाप्त करना चाहें तो मित्रों को अवश्य सुनाएं)



खिली धूप
बरसात के बाद
मुस्कान आयी होठों पर
बरसों की उदासी के बाद
दिखा चेहरा तुम्हारा
चेहरा खुद का
सैकड़ों बार शीशे में
देखने के बाद
समझते थे खुद को जोकर
छुपाते थे चेहरा अपना
तुम्हें देखने से पहले
अब जान गए
असलियत खुद की
तुम्हें देखने के  बाद
तुम लगते हो जोकर
हम लगते सिकंदर
ये जान गए आज
18-03-2012
408-142-03-12
(मित्रता समाप्त करना चाहें तो मित्रों को अवश्य सुनाएं)

बुधवार, 23 मई 2012

मन की पीड़ा अब सही ना जाए



http://joshidaniel.com/2012/03/19/180/
मुख पर खुशी नहीं
आँखों में चमक नहीं
ना हँसा जाए ना रोया जाया 
मन की पीड़ा अब सही ना जाए 
पल पल मृत्यु का भ्रम कराये
क्यों हो रहा है सब ?
कब होगा अंत इसका?
ऐसा क्या किया मैंने ?
किस भूल का
दंड मिल रहा मुझको?
प्रश्न मन को बार बार सताए
ना नींद आये ना चैन आये
मन की पीड़ा सही ना जाए
ऐसा तो
कोई पाप नहीं किया मैंने
जो जीते जी मुझे नर्क दिखाए 
पता नहीं था
जीवन इतना दुर्गम होता 
हर कदम काँटों से भरा होता
कभी तो पथ सहज मिलेगा
कदम खुशी से आगे बढेगा 
बस यही प्रार्थना इश्वर से
करता हूँ
निरंतर धैर्य और आशा से
जीता हूँ

18-03-2012
407-141-03-12

हास्य कविता-हूर के बगल में वो लंगूर कहलायेंगे




हुस्न के दीवानों से
कोई ये भी तो पूछ ले
दुनिया की नज़रों से
घूरती निगाहों से
हुस्न को संभाल कर
कैसे रखेंगे?
कैसे उनके नाज़ नखरे
उठाएंगे?
नाज़ुक हाथों से
रोटियाँ कैसे बनवायेंगे?
कैसे घर का झाडू पौंचा
लगवाएंगे?
कपडे क्या खुद धोयेंगे?
बर्तन
क्या किसी और से
मंजवायेंगे
उनके हाथ पैर दुखेंगे
तो क्या खुद दबायेंगे?
मेकअप का खर्चा
क्या पिताजी उठाएंगे?
सवेरे उठेंगे तो
चाय क्या खुद बनायेंगे?
हुस्न के दीवानों से
ये भी कोई पूछ ले
चाह तो रखते हैं मन में
पर ये भी तो जान लें
हूर के बगल में वो
लंगूर कहलायेंगे
18-03-2012
406-140-03-12

मंगलवार, 22 मई 2012

ज़िन्दगी में पहले सी रवानी नहीं होगी



वक़्त से पहले ही 
साथी के साथ
सफ़र अधूरा रह गया
यादें सहारा,
रोना साथी,बन गया
वक़्त के साथ
ये घड़ी भी कभी
गुजरेगी
फिर भी यादें
दिल दिमाग पर
दस्तक देती रहेंगी
चैन से
रहने नहीं देगी
अकेलापन कचोटेगा
बहारों में सुगंध
ज़िन्दगी में पहले सी
रवानी नहीं होगी,
18-03-2012
403-137-03-12

क्यूं भूल जाते ?


उन इल्जामों का
कोई वजूद नहीं
जो हम पर लगाए जाते  ,
गुनाहगार करार देने
के लिए
रोज़ नए किस्से बनाए
जाते
बातों के तीर चलाये
जाते
हम डर कर टूट जाएँ
थक कर झुक जाएँ
घबरा कर उनकी हर
बात मान लें
समझ नहीं आता हमें
क्यूं भूल जाते हैं ?
हमने ही सिखाया था
उन्हें
कैसे हालात से लड़ा
जाए
चाहे कुछ भी हो जाए
काले को काला,सफ़ेद को
सफ़ेद कहें
हमारी चाहत को 

कमजोरी समझने की
भूल ना करें
18-03-2012
403-137-03-12

रविवार, 20 मई 2012

यह कैसी परीक्षा है ?


यह कैसी परीक्षा है
जिस में शिष्य
परीक्षक
गुरु परीक्षार्थी है
अनुभव की प्रतिष्ठा
दांव पर है
जिसने सिखाया वो
अब गौण
जिसने सीखा वो
महान है
समय की यह कैसी
चाल है
बाप बेटा बराबर हैं
उम्र में अंतर व्यर्थ है
बड़ों को सम्मान
दूर की बात
स्वार्थ सर्वोच्च है
मैं और मेरा
सब से 
महत्त्वपूर्ण है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
18-03-2012
401-135-03-12

अब लोग रोने भी नहीं देते


लोग अब 
रोने भी नहीं देते
आंसूओं को खून के
घूँट सा पीने को कहते
डरते हैं
कहीं ज़माने ने बहते
आंसूओं को देख लिया
देखने वाले सवाल पूछेंगे
कहीं मुंह से उनका नाम
निकल गया
उन्हें जान लेंगे
घबरा कर ग़मों को
चुपचाप सहने के लिए
कहते  
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
18-03-2012
400-134-03-12