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शनिवार, 19 मई 2012

ख्वाब मेरे सूरत उनकी थी

ख्वाब मेरे
सूरत उनकी थी
रोम रोम में आग
लगाते हुए
मदहोश करती हुयी
शोख अदाएं थी
तीर चलाते हुए
दिलकश निगाहें  थी
गले में
हार पहनाती
बाहें थी
होठों पर होठों की
नमी थी
दिल में मोहब्बत की
आंधियां उड़ रही थीं
अफ़सोस की सिर्फ
अहसास की रात थी
थोड़ी देर में
सुबह होने को थी
सब बातें  ख़्वाब
की बातें थी
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
18-03-2012
399-133-03-12

एक अजीब सा रिश्ता मेरा दर्द से


एक अजीब सा 
रिश्ता मेरा दर्द से
खुशी का एक पल भी 
सुहाता नहीं उसे
खुशी की आहट भर से ही 
भेष बदल बदल कर 
आ जाता है 
कभी चोट,कभी बीमारी
अपनों की नाराजगी
कभी दुनियादारी में 
तकलीफ बन कर 
आ धमकता
हँसने के लिए 
मुंह खोला नहीं
तुरंत अपनापन 
जताता है 
बहुत मोहब्बत है 
दर्द को मुझसे
कमबख्त 
पीछा ही नहीं छोड़ता
अब सहने की 
आदत हो गयी है 
उससे दोस्ती हो गयी 
बिना उसके 
अब मन भी नहीं लगता
एक अजीब सा रिश्ता 
मेरा दर्द से
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

18-03-2012
397-131-03-12

जब अपने ही ज़ख्म देते हैं


जब
अपने ही ज़ख्म देते हैं
किसी और गम की
ज़रुरत नहीं होती
ना जीने की ख्वाइश रहती
ना हँसना मुमकिन होता
दिल टूट कर बिखर जाता
गम दोस्त बन जाता
रोना साथ निभाता है
मन में ख्याल आता है
जब हर लम्हा मरना है
तो जी कर भी क्या करना है
कैसे मुक्त हो जाऊं
बस यही सोच आता है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
17-03-2012
395-129-03-12

शुक्रवार, 18 मई 2012

प्रकृती और पर्यावरण से मज़ाक कब बंद होगा





चेहरे पर तनाव लिए
खामोशी से सब
अपनी परेशानियों से
झूझ रहे
आधी उम्र में पूरा दिख रहे 
किसी को फ़िक्र नहीं
हवा में धुएं का ज़हर बढ़ रहा
खोल कर देखो तो फेफड़े
काले हो गए
सीमेंट कंक्रीट का जंगल
महामारी की तरह अपने
पाँव पसार रहा
शहर बीमार सा लडखडाते
पैरों से चल रहा
बीमारी को विकास
समझ रहा
 संक्रमित पानी को पी कर
मिलावट से युक्त भोजन कर के
भोजन कर के
अपने को भाग्यशाली
समझ रहा
रोज़ सैकड़ों नयी जानें
धरती पर जन्म ले रही
उनकी किलकारी गूंजते ही
घरों में खुशियाँ मनती
मानों सब कह रहे हैं
आओ तुम्हारा स्वागत है
इस विकसित दुनिया में
अब तक हम भुगत रहे थे
अब तुम भी भुगतो
तभी एक जान
दुनिया से कूच करती
लोग दुःख मनाते
शायद मन में कहते हो
इसका तो पीछा छूट गया
इस विकास और विकसित
होने की लालसा से     
जाने हमारा पीछा
कब छूटेगा
प्रकृती और पर्यावरण से
मज़ाक कब बंद होगा  
17-03-2012
393-127-03-12

गुरुवार, 17 मई 2012

लाचारी में



एक जोर की
किलकारी गूंजी
एक जान ने धरती पर
आँखें खोली
सड़क किनारे लेटी
माँ की आँखें खुशी से
नम हो गयी
अगले ही पल
खुशी हवा हो गयी
सोचने लगी
नन्ही सी जान को
कैसे खिलायेगी, 
पिलाएगी
अपना पेट भरना 
ही कठिन
इसकी भूख कैसे मिटाएगी
कैसे हवस के भूखे
भेड़ियों से
इसकी अस्मत बचायेगी
विचारों ने पथ
चेहरे ने रंगत बदली
लाचारी में खुद से 
कहने लगी
जो होगा देखा जाएगा
जैसे मैं अब तक जी 
रही हूँ
वैसे ही ये भी जी लेगी
जो इसकी
किस्मत में लिखा होगा
भुगत लेगी
अभी तो इसका पेट
भर दूं
जो मेरे हाथ में है 
वह तो कर दूं
फिर दूध पिलाने लगी

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
17-03-2012
392-126-03-12

जो बनते हैं सहारा लोगों के

जो बनते सहारा लोगों के
देते हिम्मत होंसला उनको
रोते से हंसाते उनको
बांटते मुस्कान ज़माने को
उन्हें खुद का ख्याल नहीं होता
अकेले  अँधेरे कमरे में रोते हैं
चुपचाप सहते हैं
कैसे समझाए उन्हें कोई
अँधेरे से निकल कर
उजाले में आ जाओ
कुछ अपना भी ख्याल करो
चाहने वालों को मायूस
ना करो
जिन्हें हंसाया था बड़ी
मुश्किल से
उन्हें फिर से ना रुलाओ

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
17-03-2012
391-125-03-12
E

बुधवार, 16 मई 2012

कभी कहते थे तुम .......

कभी कहते थे तुम
हम मंजिल तुम्हारी
तुम मंजिल हमारी
दो धाराएं दिलों  की
मिल कर बनेगी एक
नदी मोहब्बत की
साथ धड्केंगे साथ
जियेंगे
एक दूजे के खातिर 
क्यों फिर
रास्ता मोड़ा तुमने
बदल दी मंजिल अपनी
तोड़ दिए वादे 
कर दिया बदनाम
मोहब्बत को
इतना भी ख्याल नहीं
आया तुम्हें
जब पता चलेगा
ज़माने को
लोग मोहब्बत के
नाम से नफरत करेंगे
वादों से यकीन
अपना उठा देंगे
17-03-2012
390-124-03-12

मंगलवार, 15 मई 2012

मेरा नसीब कहता है

मेरे हाथों की लकीरों में
हर तरफ
तेरा नाम लिखा है
फिर तूँ मेरे साथ
क्यूं नहीं है
या तो लकीरों का
इम्तहान ले रही है
या फिर खुद के हाथ से
 मेरा नाम मिटा रही है

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
17-03-2012
389-123-03-12

दिल को कहीं और छोड़ आए हैं



रात आए थे
निगाहें
बदली हुयी थी
चेहरे पर खुशी
होठों पर मुस्काराहट
मिलने में
गर्मी भी ना थी
यूँ लगा जैसे रस्म
निभाने आए हैं
दिल को कहीं और
छोड़ आए हैं  
17-03-2012
388-122-03-12

अब कैसे उनसे आस लगाएँ

उनसे आस लगाएँ
घर के सामने से
निकल गए
हम उन्हें याद ना आए
अब चाहे मौसम
खुशगवार हो जाए
चांदनी रात आए
कैसे उनको को याद करें
जो खामोशी से जुदा
हो गए
बिना वजह रुस्वां
हो गए
कैसे सदा दे कर उन्हें
बुलाएं
17-03-2012
387-121-03-12

अपनी महफ़िल से मत निकालो मुझे

अपनी महफ़िल से
मत निकालो मुझे
बड़ी मुश्किल से
सहारा मिला था मुझे
अरसे बाद हँसना हुआ था
चैन की नींद सोया था
क्यों रातों में फिर से
जगाना चाहते
हँसते हुए को रुलाना
चाहते
खानाबदोशों सा
जिलाना चाहते
ना चाहो तो
मोहब्बत ना करो हमसे
दिल पर पत्थर रख लो
अपनी महफ़िल में
रहने दो मुझे
अपनी महफ़िल से
मत निकालों मुझे
16-03-2012
386-120-03-12

सोमवार, 14 मई 2012

बोगेनवेलिया


बोगेनवेलिया
तुम्हारे पुष्प तो बहुत
सुन्दर होते हैं
लाल पीले सफ़ेद नारंगी
और भी कई रंगों के
दूर से ही लुभाते हैं
पास जाता हूँ
तो उन्हें सुगंधहीन
पाता हूँ
सोचता हूँ क्या हुआ
अगर सुगंधहीन है
एक गुच्छा तोड़ कर
फूलदान में ही लगा दूं
नयनों को
सुख प्रदान कर दूं
गुच्छा तोड़ने के लिए
हाथ बढाता हूँ ,
बेल का काँटा बेरहमी से
मेरे अंगूठे में चुभता है
पीड़ा से सहर उठता हूँ
मन में विचार आता है
ऐसे सुगंधहीन
पुष्प का क्या करूँ
जिसे फूलदान में भी
नहीं लगा सकता हूँ
विचार बदलता हूँ
कोई बात नहीं
तुम्हारे पुष्प नयनों को
सुख प्रदान करते हैं
वही बहुत है
उन लोगों से तो अच्छे हैं
जो दुःख के
सिवाय कुछ नहीं देते
इर्ष्या द्वेष से जीते हैं 

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
16-03-2012
385-119-03-12