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शनिवार, 5 मई 2012

सब्र के कपडे पहन लें ,मन में सहनशीलता ओढ़ लें


तुम कहो मैं सुनूँ 
जैसा चाहो वैसा करूँ
 मानूं नहीं तो
 तुम रूठ जाओ
फिर मैं तुम्हें मनाऊँ 
मैं कहूं तुम सुनो 
जो चाहूँ वो करो 
नहीं करो तो मैं रूठ जाऊं
फिर तुम मुझे मनाओ 
दोनों यूँ ही 
रूठते मनाते रहेंगे 
आपस में 
लड़ते झगड़ते रहेंगे 
जीवन यूँ ही काटते रहेंगे
ना नें खुश रहूँगा 
ना तुम खुश रहोगे
क्यों ना 
थोड़ा सा खुद को 
बदल लें
रूठने मनाने की 
आवश्यकता ना पड़े
दोनों सब्र के कपडे 
पहन लें
मन में सहनशीलता 
ओढ़ लें
कुछ मेरा कुछ तुम्हारे 
मन का कर लें
जीवन काटने के जगह 
खुशी से जी लें 
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
12-03-2012
353-87-03-12

शुक्रवार, 4 मई 2012

अपेक्षाओं का संसार


कमरे की खिड़की के
बाहर झांकता हूँ
मेरे द्वारा रोपा हुआ
नीम का पेड़ दिखता है
रोपने के तीन चार वर्षों तक
उसे नियमित रूप से
सींचा था
वो भी अपनी इच्छा से
उसने कभी नहीं कहा
मुझे पानी से सीचों
पर उसने सदा ही
कुछ ना कुछ सबको दिया
छाल,पत्तों, टहनियों,
कोपलों और निम्बोलियों को
पूरी कॉलनी के लोगों ने
भरपूर काम में लिया
धन्यवाद का एक शब्द भी
उसे कभी किसी ने नहीं कहा
पक्षियों ने उसकी डालियों को
घोंसलों से सुशोभित किया
राहगीरों ने उसकी छाया में
विश्राम किया
पर नीम के पेड़ ने कभी
किसी से
बदले में कुछ नहीं माँगा
मूक और शांत रह कर
निस्वार्थ भाव से सबको
कुछ ना कुछ देता रहा
और तो और समय समय पर
उसकी डालियों को काट कर
उसे कष्ट पहुंचाया,
वह चुपचाप सहता रहा,
पीड़ा सहने के बाद
पहले से भी अधिक कोपलें
उसमें प्रस्फुटित हुयी ,
नयी टहनियों ने जन्म लिया,
आज नीम के पेड़ ने मुझे
सोचने के लिए बाध्य
कर दिया
मनुष्य उससे कितना कुछ
सीख सकता
सक्षम होने के बाद भी
जीवन भर अपेक्षाएं तो
रखता है
पर देने के नाम पर
सोच में पड़ जाता है
12-03-2012
352-86-03-12

चाँद को देख कर क्या करूंगा ,जब तुम सामने खडी हो


चाँद को
देख कर क्या करूंगा
जब तुम सामने खडी हो
तारों की झिलमिलाहट भी
तुम्हारी झिलमिलाहट से
तो कम है
चाँद पहुंचाता ज़मीन को
ठंडक
दिल फिर भी प्यासा
रह जाता
तुम ठंडक के साथ
दिल की
प्यास भी बुझाती हो
हर मामले में चाँद को
शर्माती हो
  गर खुदा को पता होता
तुम्हारी ख़ूबसूरती का
चाँद को
भेजता ज़मीं पर
तुम्हें चाँद की जगह
अपने पास रखता
12-03-2012
351-85-03-12

गुरुवार, 3 मई 2012

मच चुका हंगामा महफ़िल-ऐ-ज़िन्दगी में बहुत


मच चुका हंगामा
महफ़िल-ऐ-ज़िन्दगी
में इतना 
कैसे अमन कायम करूँ
अब ज़हन में सिर्फ
यही एक सवाल है
किस पर ऐतबार करूँ
किस पर शक करूँ
समझ के बाहर है
लगता है 
खुद और खुदा पर 
यकीन के सिवाय
अब नहीं 
कोई और इलाज है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  
12-03-2012
350-83-03-12

बुधवार, 2 मई 2012

परिस्थितियों के अनुसार


ना सूरज का
पूरब से निकलना
बदलता
ना पश्चिम में ढलना
बदलता
बदलना पड़ता तो
मनुष्य को बदलना पड़ता
परिस्थितियों के अनुसार
ढलना पड़ता
समय के सामने झुकना
पड़ता
जो समझ गया इस
बात को
उसका जीवन सरल
हो जाता
जो नहीं समझता
निरंतर हठ करता रहता
अहम् अहंकार को नहीं
छोड़ता
अपनी जिद पर अड़ा
रहता
जीवन भर ना सफल होता
ना चैन पाता
अंत तक व्यथित रहता
11-03-2012
348-81-03-12

किसके चेहरे पर हिन्दू लिखा?,किसके चेहरे पर मुसलमान?

किसके चेहरे पर हिन्दू लिखा

किसके चेहरे पर मुसलमान

एक से कपडे पहन लें 

एक ज़बान बोल लें 

न रखें ढाढी चोटी

कौन कह सकता है

कौन हिन्दू कौन मुसलमान

खून निकाल कर मिलान कर लो

हिन्दू का खून मुसलमान के 

मुसलमान का हिन्दू से मिलेगा 

खुशी में हँसता हो दर्द में रोता हो

कहाँ पता चलता

कौन हिन्दू कौन मुसलमान

जो कहा राम ने

वही कहा अल्ला ने

सबने अपने अपने

तरीके  से तोड़ा मरोड़ा

बदल दिए मायने 

बना दिया धर्म को

झगडे का कारण

खडी कर दी नफरत की 

दीवारें  बीच में

अब भी वक़्त है भूल सुधार लें 

वो कर लें जो कहा

अल्ला और राम ने

हर धर्म का सम्मान करें 

मिलजुल कर रहे  

हँसते गाते जिए साथ में

न किसी को हिन्दू समझें 

न समझें किसी को मुसलमान 

सब को समझें अपने जैसा इंसान  

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

11-03-2012
347-80-03-12

मंगलवार, 1 मई 2012

ना चाहो तो


ना चाहो तो
ख़त का जवाब ना दो
ना कभी मिलो हमसे
जानते हैं
कुछ तो मजबूरी होगी
तुम्हारी
जो रूबरू नहीं होते
हमसे
तुम याद करते हो
यही काफी हमारे लिए
रिश्तों को तोड़ना
हमारी फितरत नहीं
किसी और सहारे की
हमको ज़रुरत नहीं
तुम खुश रहो
यही काफी है जीने
के लिए   
11-03-2012
346-79-03-12

सोमवार, 30 अप्रैल 2012

हास्य कविता-बुखार का इलाज कर दो ,जुखाम को भाड़ में जाने दो


हास्य कविता-बुखार का इलाज कर दो ,जुखाम को भाड़ में जाने दो
====================================
जुखाम बुखार से पीड़ित
हँसमुखजी सीधे पहुंचे
डाक्टर के पास
कहने लगे बुखार का
इलाज कर दो
जुखाम को यूँ ही छोड़ दो
डाक्टर चकराया
फ़ौरन बोला कारण बताओ
हँसमुखजी बोले
पहले भी हुआ था जुखाम
खाई थी गोली,
हुआ रिएक्शन
मुंह में हो गए छाले
छालों की दवा खाई
उसने भी किया रिएक्शन
याददाश्त चली गयी
फिर गज़ब हो गया
पत्नी को समझा मुन्नीबाई
पांच सौ का नोट थमा कर
नाचने को कह दिया
पत्नी फुफकारी
गर्दन से पकड़ कर चौराहे
पर लायी
करी ज़बरदस्त धुनायी
इज्ज़त की हाय हाय हो गयी
पिटता तो पहले भी रोज़ था
पर सरे बाज़ार इज्ज़त का
फलूदा नहीं बनता था
आप तो 
बुखार का इलाज कर दो
जुखाम को भाड़ में जाने दो

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
11-03-2012
343-77-03-12

ज़िन्दगी में गम यूँ ही नहीं आते


 ज़िन्दगी में गम
यूँ ही नहीं आते
पूरे नाज़ नखरों के
साथ आते
जब भी आते पूरा
साथ निभाते 
नए लोग मिलते
मीठी बातें होती
कई मुलाकातें होती
उम्मीदें जागती 
चेहरे पर खुशी आती
महफ़िल सजने की
बारी आती 
अचानक खबर आती
वो रुस्वां हो गए
फिर क़त्ल की रात आती
ज़माने को पता चलता
अब ये भी ग़मज़दा
हो गया
लोगों को बात करने का
मसला मिल जाता
ग़मों को बढाने का पूरा 
इंतजाम हो जाता
समझ लो वापस नहीं
जाने के लिए
गम आ गया है
11-03-2012
342-76-03-12

रविवार, 29 अप्रैल 2012

हास्य कविता-मुन्नीबाई,चमेलीबाई पर कोई बढ़िया कविता लिख कर भेज दो


पत्रिका के सम्पादक ने
हँसमुखजी को चिट्ठी लिखी
मुन्नीबाई,चमेलीबाई
पर कोई बढ़िया कविता
लिख कर भेज दो
हँसमुखजी चकराए
फ़ौरन उत्तर दिया
देशभक्ती,
भाईचारे ईमान,धर्म
प्यार मोहब्बत पर
लिखवा लो
मुन्नी,चमेली,जलेबी से
पीछा छुडवा दो
सम्पादक ने जवाब में
खेद व्यक्त करते हुए
जवाब दिया
आज कल पत्रिका में वही
छपता है
जो बाज़ार में बिकता है
आज कल ईमान धर्म
देश भक्ती के बारे में कौन
पढता है
10-03-2012
340-74-03-12

लोग पूंछते मुझसे,होली क्यों नहीं खेली?


लोग पूंछते मुझसे
होली क्यों नहीं खेली?
मैं कहता हूँ
तुम्ही बताओ
कैसे मैं होली खेलूँ?
कैसे दीपावली मनाऊँ?
कोई समझाए मुझे
जब गरीब के सर पर
छत नहीं
भूखे को रोटी नहीं
ईमान की कोई कद्र नहीं
बड़ों को सम्मान नहीं
नारी अब सुरक्षित नहीं
मिठाई दूध सब नकली
मिलता
भाई को भाई दुश्मन
लगता
जब मनों में प्यार नहीं
कैसे कोई त्योंहार मनाऊँ?
क्या होली
क्या दीपावली मनाऊँ
10-03-2012
339-73-03-12