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शनिवार, 28 अप्रैल 2012

कुछ तो ख़ास होगा उनमें ,जो मन करता उनसे बात करूँ


कुछ तो
ख़ास होगा उनमें
जो मन करता उनसे
बात करूँ
मन खुश होता
ह्रदय तृप्त होता
भावनाओं को चैन का
अहसास होता
मन के पक्षी को
उड़ने को आकाश
मिलता
ह्रदय को अपनापन
लगता
भावनाओं को विश्राम
मिलता
बेचैनी को विदायी
उम्मीदों को सहारा
मन को विश्वास
ह्रदय को आराम
मिलता
जो मिलता नहीं
अपनों से
वो उनसे मिलता
कुछ तो
ख़ास होगा उनमें
जो मन करता उनसे
बात करूँ
10-03-2012
338-72-03-12

ऐ मालिक तेरी इस दुनिया में क्यों तूने ऐसा किया ?



ऐ मालिक
तेरी इस दुनिया में
क्यों तूने ऐसा किया ?
किसी को राजा
किसी को  रंक बनाया
एक भरे पेट को भर रहा
दूसरा खाली पेट लिए
तरस रहा
एक पैदा होते ही भूख से
बिलख रहा
दूसरा भरे पेट भी रो रहा
जो जी रहा ईमान से
वो कंगाली में जी रहा
बेईमानी ईमान जिसका
वो अट्टहास कर रहा
कोई ले रहा जान किसी की
कोई दूसरों की जान
बचाने के खातिर
अपनी जान दे रहा 
एक तेरे नाम पर पैसा
बटोर रहा
ऊंचे आसन पर बैठ
तुझे पाने के अचूक नुस्खे
बता रहा 
दूसरा दिल से तेरा नाम
ले रहा
ज़मीन पर बैठ कर
तुझे पाने के तरीके
सुन रहा
ऐ मालिक अब तक
समझा नहीं
क्यों जहर के साथ
अमृत
मनुष्य के साथ असुर
बनाया
तेरी इस दुनिया में
ऐ मालिक
कैसा ये तेरा न्याय ?
10-03-2012
336-70-03-12

शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012

नन्ही चिड़िया ने पंख फैलाए


नन्ही चिड़िया ने 
पंख फैलाए
उमंग उत्साह से 
उड़ चली  
आकाश नापने
पहुँच गयी ऊंचे पर्वत
के पास
बार बार प्रयत्न किया 
पार ना कर सकी पर्वत को
थक हार मुंह लटका कर
लौट आयी माँ के पास
हार से व्यथित
माँ से शिकायत करने लगी 
क्यों नहीं सिखाया उसने 
पर्वत को पार करने
का राज़
माँ मुस्कारा कर बोली
सब्र और संयम रखो
एक दिन
पर्वत भी पार करोगी
थोड़ी शक्ति और संजो लो
ठीक से उड़ना सीख लो
फिर पर्वत को पार करो
सफलता
कदम अवश्य चूमेगी
पर्वत को पार करने की
इच्छा एक दिन
अवश्य पूरी होगी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर...
10-03-2012
335-69-03-12

गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

अभी से जाने का नाम ना लो


अभी से
जाने का नाम ना लो
कुछ देर तो मेरे पास बैठो
अभी तो ठीक से देखा
भी नहीं
मन भरना तो बहुत
दूर की बात
मेरे रोम रोम में समा जाओ
अपनी रूह को
मेरी रूह में मिल जाने दो
जाने से पहले
कुछ ऐसा कर जाओ
दिल कभी ना रहे उदास
हर लम्हा
अहसास रहे तुम्हारा
फिर चाहो तो चले जाना
09-03-2012
333-67-03-12

बुधवार, 25 अप्रैल 2012

जीत का सेहरा


मैं तो एक दिन
दुनिया से चला जाऊंगा
पीछे छोड़ जाऊंगा 
कुछ रिश्ते
कुछ पैसे ,कुछ सामान
मकान 
जिस में रहता हूँ
रह जायेंगी
कुछ यादें,कुछ बातें
जिन्हें याद कर कोई
हँसेगा
कोई दुःख मनायेगा
किसी को याद आऊँगा
कोई भूल जाएगा
समय के साथ सब
धुंधला होता जाएगा 
पर मेरी लिखी
कविताओं को कोई नहीं
मिटा सकेगा
उनमें छुपी बातों को
कोई नहीं हटा सकेगा
उनमें मेरा सोच है
 मन के भाव हैं
जो भी ह्रदय कहता
वो सब भरा है
क्या भुगता,क्या सहा
क्या मिला,क्या ना मिला
क्या करा,क्या ना करा 
सब का अम्बार है
जो भी पढेगा उनको
समझेगा मुझको
यह ही क्या कम होगा
मेरे जाने के बाद
मुझे वह मिलेगा
जो जीते जी
नहीं मिल सका मुझको
जीवन भर
हारते रहने के बाद तो
जीत का सेहरा
 सर बंध ही जाएगा  
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
09-03-2012
332-66-03-12

अब खुद को आजमाऊंगा


बहुत आजमा लिया
ज़माने को
अब खुद को आजमाऊंगा
अँधेरे से लौट कर
उजाले में आऊँगा
हिम्मत होंसले से
लडूंगा
ज़ज्बा नहीं खोऊँगा
खुद पर यकीन रखूंगा
उम्मीदों को हकीकत में
बदल दूंगा
फिर से मुस्काराऊंगा
निरंतर खुशियाँ
मनाऊंगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
09-03-2012
331-65-03-12

मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

अब जवाब लेकर जायेंगे


इंतज़ार करते करते 
आजिज़ आ गए
अब दिल की हसरतों को 
इज़हार करने 
हम उनके दर पर आये हैं 
दिल धड़क रहा 
मन घबरा रहा
वो दिल में बसते हमारे
हम अनजान उनके लिए
फिर भी हिम्मत कर के 
उम्मीदों की बरात लेकर 
आये हैं
या तो वो इल्तजा कबूल 
कर लेंगे
या खाली हाथ लौटा देंगे
हम भी या तो दीवाली
मनाएंगे 
या ख्वाइशों की होली 
जलाएंगे 
अब और इंतज़ार नहीं 
करेंगे 
हर हाल में अब जवाब 
लेकर जायेंगे 
08-03-2012
330-64-03-12

सोमवार, 23 अप्रैल 2012

ज़िन्दगी क्या है ,कोई ना जाना अब तक


ज़िन्दगी क्या है
कोई ना जाना अब तक
सबने अपने अपने
अंदाज़ से देखा उसे
अपनी अपनी
निगाहों से पहचाना उसे 
किसी ने
नाम दिया ज़न्नत का
किसी ने
दोजख बता दिया
कोई बोला
ज़िन्दगी कशमकश
तो किसी ने कहा मोहब्बत
कुछ ने कहा
ज़िन्दगी एक ऐसा मंज़र
जहां हँसना रोना साथ है
एक राय
कोई कर ना कर सका
अब तक
बस इतना ज़रूर पता है 
दिल जब तक धड़कता
इंसान ज़िंदा कहलाता
जिस दिन रुक गया
समझो सफ़र पूरा हुआ
ज़िन्दगी क्या है
कोई ना जाना
अब तक
08-03-2012
329-63-03-12

ना चाहो तो मत पहचानना हमें


जब भी मिलो
ना चाहो तो 
हमें पहचानना मत
दुनिया को
दिखाना मत
अनजान समझ
दो बात कर लेना
हम खामोशी से
तुम्हारे
खूबसूरत चेहरे को
करीब से देख लेंगे
मन ही मन खुश
हो लेंगे
दिल को सुकून
दे देंगे
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 


08-03-2012
327-61-03-12

कामयाबी नहीं मिली तो रोना किस बात का



कामयाबी नहीं मिली
तो रोना किस बात का
रोने से किसको मिला है
जो तुम को मिलेगा
उठो अब खड़े हो जाओ
मुंह लटकाना बंद करो
हँसते हुए कमर क़स लो
मेहनत करना शुरू करो 
ज़रूरी नहीं एक के
पीछे ही पड़े रहो
ये नहीं तो वो कर लो
इस में नहीं तो उस में
मिल जायेगी
कामयाबी इक दिन
तुम्हें ज़रूर मिलेगी
औरों को भी रास्ता
दिखायेगी
08-03-2012
326-60-03-12

रविवार, 22 अप्रैल 2012

इतना सा बता दो(हास्य कविता)



कैसे हमें देख लें ?
ह्रदय की बात सुन लें
पत्नी उन्हें बना लें
इतना सा बता दो
रूठ जाएँ तो
कैसे उन्हें मनाएं ?
इतना सा बता दो
क्रोध में
आग बबूला हो जाएँ
कैसे उन्हें ठंडा करें ?
इतना सा बता दो
चुप हो जाएँ
एक शब्द भी ना बोलें
कैसे बुलवाएँ ?
इतना सा बता दो
किसी से
हँस कर बात कर लें
वोउसे सौत समझ लें
कैसे उन्हें समझाएँ ?
इतना सा बता दो
चलो नारियों से ही
पूंछ लें
पत्नी को कैसे खुश
रखा जाए ? 
इतना सा बता दो
08-03-2012
324-58-03-12
(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर कविता)

काव्यात्मक लघु कथा-घ्रणा और द्वेष कहाँ से आता है



काव्यात्मक लघु कथा -घ्रणा और द्वेष कहाँ से आता है
=================
शहर में साम्प्रादायिक
दंगों के बाद
आज कर्फ्यू का तीसरा
दिन था
खाने को घर में दाना नहीं
बेचने के लिए आढ़तिए से
जो सब्जी खरीदी थी
पड़े पड़े खराब हो गयी 
पैसे पहले ही खत्म हो चुके थे
पिछले पूरे हफ्ते बीमार
रही थी
कल ही तो हफ्ते भर बाद
पहली बार सब्जी बेचने
फेरी पर निकली थी
कर्फ्यू खुलेगा तब भी
ना तो कुछ
बेचने के लिए बचेगा
ना ही कुछ
खरीदने के लिए बचा है
बुढिया असमंजस में
सोचने लगी
क्यों धर्म और सम्प्रदाय
के नाम पर
लोग एक दूसरे को मारते हैं
उसने तो कभी नहीं सोचा
सब्जी किसके खेत की है
उसे तो ये भी नहीं पता
उससे सब्जी
मुसलमान खरीदता है
या हिन्दू
वही सब्जी दोनों के
घर में पकायी  जाती
दोनों ही उसको खाते हैं ,
फिर मन में
घ्रणा और द्वेष कहाँ से
आता है
सोचते सोचते परमात्मा से
प्रार्थना करने लगी,
सबको सदबुद्धी दे
इंसान को इंसान
समझना सिखाये
प्रार्थना करते करते
उसकी आँख लग गयी
भूखे पेट ही नींद की
गोद में समा गयी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
08-03-2012
323-57-03-12