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शनिवार, 31 मार्च 2012

बसंत के आगमन पर


बसंत के आगमन पर
उस की पीली चुनडी
मेरे मन को ढक लेती है
मैं आँखें बंद कर
बसन्ती
बयार में खो जाता हूँ
बसंत बहार की मादक सुगंध
मेरे मस्तिष्क को
अप्सराओं के संसार में
विचरण कराने लगती
बसन्ती दोपहर में नर्म धूप
ह्रदय में प्यार की गर्माहट को
जन्म देती है
मैं अपनी सुधबुध खो देता हूँ
ऐसा लगने लगता मैं
मैं नहीं हूँ
साक्षात बसंत हूँ
जो धरती पर
महक और खुशियाँ फैलाने
युवा ह्रदयों में प्यार जगाने
उनकी धड़कन बढाने
आया हूँ
उनके बुझे चेहरों को
मुस्काराहट से सजाने
आया हूँ
02-03-2012
272-07-03-12

शुक्रवार, 30 मार्च 2012

अपेक्षाओं के समुद्र में


अपेक्षाओं के समुद्र में
गोता लगाना छोड़ दो
जितनी गहरायी में
जाओगे
गंद साथ लाओगे
अपेक्षाओं की थाह
फिर भी कभी ना
पाओगे
मन की व्यथा बढाओगे
चैन अपना खोओगे
रिश्तों से हाथ धोओगे
पाना हैं चैन जीवन में
अपेक्षा रखना छोड़ दो
इच्छाओं को कम करो
निरंतर
संतुष्ट
रहना सीख लो
अपेक्षाओं के समुद्र में
गोता लगाना छोड़ दो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
01-03-2012
271-06-03-12

उम्र की शाम





सहना 
पड़ता 
 काटना 


01-03-2012
20-05-03-12

ज़िन्दगी एक खेल तमाशा ,खेल रहा हूँ





01-03-2012
269-04-03-12

गुरुवार, 29 मार्च 2012

अब किसी को करीब से देखना नहीं चाहता




नहीं चाहता
दिल को और 
तोड़ना नहीं चाहता

अच्छा है
चाहता
नहीं चाहता
नहीं चाहता
से जीना चाहता 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
01-03-2012
268-03-03-12

अगर वो खुद आ जाती तो .........





डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
01-03-2012
267-02-03-12


शायरी 

बुधवार, 28 मार्च 2012

मुक्त हो लो



ना चुप रहो
ना सपनों में मिलो
हमसे
इससे तो अच्छा है
भुला दो हमको
हम भूलें ना भूलें
चैन मिले ना मिले
इस तरह
तिल तिल कर के
ना मारो
कोई नया साथ ढूंढ लो
नफरत की आग से
मुक्त हो लो
कम से कम तुम तो
चैन से रह लो
खुशी से जी लो
01-03-2012
266-01-03-12

खुशी का लम्हा लम्हा वक़्त के समंदर में डूब गया

खुशी का लम्हा लम्हा
वक़्त के 
समंदर में डूब गया
यादों के 
सहरा में बदल गया 
हर अपना 
वादे से मुकर गया
तन्हाई में 
अकेला छोड़ गया
ज़िन्दगी का 
लम्हा लम्हा ठहर गया 
उम्मीद का चाँद 
ग़मों के बादलों खो गया
फलक पर उम्मीद का 
एक तारा भी
टिमटिमाता नहीं दिखता
जो जीने का सबब बन जाए 
अब रह गया 
सिर्फ आसरा खुदा का
पहले भी कई बार
उसने ही निकाली
किश्ती तूफान से 
इस बार भी वो ही
निकालेगा
खुशी के कुछ पल तो
लौटाएगा
सुकून का अहसास तो 
कराएगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
25-02-2012
248-159-02-१२
सुकून,वक़्त,यादें,खुशी

हास्य कविता-हँसमुखजी की कुछ ना कुछ कहने की आदत


हँसमुखजी की
कुछ ना कुछ कहने की
आदत का सामना एक दिन
मुझको भी करना पडा
मुझ से बोले भाई निरंतर
क्या आप निरंतर खाते हैं
निरंतर बोलते हैं ,निरंतर सोते हैं
निरंतर जागते हैं
जो आपने अपना नाम
निरंतर रख लिया
फिर भी अगर रखना ही था तो
उसकी जगह लगातार,बिना रुके ,
कनटीन्यूअस (continuous)
भी तो रख सकते थे
उनके बेहूदा सवाल पर
मेरा पारा चढ़ गया
उनकी बे
सिर पैर की
बात करने की आदत  
छुडाने का निर्णय लिया
मैंने कहा
मैं निरंतर सोचता हूँ
निरंतर हँसता हूँ
निरंतर आपके बेहूदा
कारनामों और छिछोरी आदत के
बारे में लिख कर पाठकों को
बताता हूँ
ताकि सब आपको पहचान लें
आपकी चाल से आप को
ही मात दें
इसलिए अपना नाम निरंतर रखा है
उस दिन के बाद से
हँसमुखजी सबको सलाह देते हैं
किसी से भी बेसिर पैर की
बात नहीं कहनी चाहिए
केवल कहने के लिए भी
कोई बात नहीं कहनी
चाहिए
25-02-2012
247-158-02-12

मंगलवार, 27 मार्च 2012

ये गनीमत थी उन्होंने हमें पहचान लिया


ये गनीमत थी
उन्होंने
हमें पहचान लिया
ये बात जुदा हैं
वो हमसे नज़रें
चुराते रहे
हमसे बचने की
कोशिश करते रहे
उनकी बेवफायी के
गुनाह ने
उन्हें हमारा सामना
ना करने दिया
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

शायरी,बेवफाई,
25-02-2012
246-157-02-12

जिस पौधे में कलियाँ ना खिले वो किसे भाता ?


जिस पौधे में
कलियाँ ना खिले
वो किसे भाता ?
जो कली फूल बन कर
ना खिले
उसे कौन चाहता ?
जो फूल
रूप से नहीं लुभाए
वो किसे अच्छा लगता ?
महक से
मदमस्त ना करें
उसे कौन याद रखता?
जो मनुष्य
मधुर व्यवहार ना करे
वो किसे भाता ?
जो कर्मों की 
महक
जग में ना फैलाए
उसे कौन याद रखता?

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
25-02-2012
243-154-02-12

ज़िन्दगी किसकी रुकी है जो मेरी रुकेगी


ज़िन्दगी 
किसकी रुकी है
जो मेरी रुकेगी
चाहे 
घिसटते हुए चले
कुलांचें मारते हुए चले
ज़िन्दगी तो चलती रहेगी
हँसते हुए चले
रोते हुए चले
शांती पूर्वक चले
व्यथित हो कर चले
फर्क इतना ही पडेगा
समय के साथ 
ज़िन्दगी 
चमकती आँखों से जायेगी
या समय से पहले
बुझी आँखों से 
जायेगी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
25-02-2012
242-153-02-12

सोमवार, 26 मार्च 2012

शौक-ऐ-इश्क अभी गया नहीं


आँखों की चमक 
अश्कों को नहीं भायी
दिल की खुशी
बेदिलों को नहीं भायी
मन का सुकून
दुश्मनों को नहीं भाया
हर तरफ से हमें
निशाना बनाया गया
किस्मत का हर तीर
निशाने पर लगा
अपना पराया हो गया
अश्कों ने बहना शुरू
कर दिया
दिल दर्द से तड़पने लगा
सुकून सपना हो गया
होंसला
फिर भी टूटा नहीं
शौक-ऐ-इश्क अभी
गया नहीं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

शायरी,
25-02-2012
241-152-02-12

हमने भी ठान ली हार नहीं मानेंगे

रुकावटें आती 

रहीं हैं

रुकावटें आती 

रहेंगी

पथ से डिगाने की

कोशिशें होती 

रहेंगी 

हमने भी ठान ली

हार नहीं मानेंगे

सब्र नहीं खोएंगे

ज़ज्बा बनाए रखेंगे

हिम्मत से लड़ेंगे

थक भले ही जाएँ

मगर टूटेंगे नहीं 

पर्बतों को भी

झुका देंगे

दुश्मनों को

ज़मीन की धूल

चटा देंगे

हवाओं का 

रुख बदल देंगे

भाग्य को पलट देंगे 

एक दिन मंजिल

पा ही लेंगे  

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

जीवन,हिम्मत,जीवन मन्त्र

25-02-2012
240-151-02-12

जब जहर पीते रहना है,घुट घुट कर जीना है


कुछ करूंगा तो भी
तोहमत लगेगी
ना करूंगा तो भी
तोहमत लगेगी
हर बार गुनाहगार
कहलाऊंगा
खुद को सवालों से
घिरा पाऊंगा
बार बार बेगुनाही
साबित करनी पड़ेगी
जब
जहर पीते रहना है
घुट घुट कर जीना है
तो क्यों परवाह करूँ
लोगों की
जिस को जो भी
समझना है समझ ले
जो भी मानना है
मान ले
ना हारा कभी
ना अब हारूंगा
करूंगा वही जो मेरा
ईमान कहता है
मेरा ज़मीर मेरे साथ है
मेरा खुदा मेरे साथ है

25-02-2012
239-150-02-12

रविवार, 25 मार्च 2012

बेचारी अटेची


मुझे यात्रा में
काम आने वाली अटेची
पर बहुत दया आती
अमीर गरीब
हर घर में मिलती 
देश विदेश
सब जगह साथ निभाती
यात्रा पर जाना होता
तो सबसे प्रिय बन जाती
झाड पोंछ कर साफ़
करी जाती 
पसंद के सामान से
सजायी जाती
ट्रेन हो या हवाई जहाज
सदा वो ही मस्तिष्क में रहती
ओझल ना हो जाए
दृष्टी बार बार उसी पर जाती
यात्रा पूरी ना हो जाए जब तक
ह्रदय में निवास करती
एक बार लौट कर आ जाओ
तो सौतेले व्यवहार का
शिकार होती
मूक रह कर सहती रहती
सामान निकाल कर
पलंग के नीचे
अलमारी के ऊपर
या भुखारी में छुपा दी जाती
यात्रा में लगाए नाम की
चिप्पियाँ तक
उतारी नहीं जाती 
महीनों धूल खाती रहती
किसे ऐसे रिश्तेदार जैसे होती
जिसे विवाह के अवसर पर
शान बढाने के लिए
बुलाया जाता
विवाह संपन्न होते ही
भुला दिया जाता 
24-02-2012
237-148-02-12