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शनिवार, 3 मार्च 2012

हम खुद गर्ज़ नहीं


कभी ये ना समझना
हम तुम्हें याद नहीं करते
ये बात जुदा है
हाल-ऐ-दिल नहीं बताते
तुम्हारे सोये हुए
ज़ज्बातों को
जगाना नहीं चाहते
मोहब्बत की
बुझी हुयी आग को
फिर से
भड़काना नहीं चाहते
हम खुद गर्ज़ नहीं
अपनी हसरतों की
चाहत में
तुम्हारी बसी हुयी
दुनिया उजाड़ दें  

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
15-02-2012
173-84-02-12

बाल कविता-प्यारा दुलारा नन्हा सा पिल्ला


प्यारा दुलारा
नन्हा सा पिल्ला
घर में सब को अच्छा
लगता
कुछ वर्षों में बड़ा हो कर
कुत्ता कहलायेगा 
अनजान को देख कर
जोर से भौंकेगा
घर में सब को चौकन्ना
करेगा
चोरों को घर में घुसने
नहीं देगा
उनसे हमारी रक्षा करेगा
सुबह शाम घूमने जाएगा
दूध रोटी से पेट भरेगा
घर वालों को देख
प्यार से पूंछ हिलाएगा
खूब दौड़ेगा,खूब खेलेगा
निरंतर हमको अपना
समझेगा
हमको कभी नहीं काटेगा
जानवर हो कर भी
परिवार का सदस्य
कहलायेगा
मरते दम तक
वफादारी निभाएगा 

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
15-02-2012
172-83-02-12

शुक्रवार, 2 मार्च 2012

आंसू भी सूख जाते हैं



लोग इस हद तक 
दुखी हो जाते हैं 
रोना तक भूल जाते हैं 
आंसू भी सूख जाते हैं 
हँसने  का
तो सवाल ही नहीं
हर लम्हा
सहते सहते कटता है 
जीना भी
मुश्किल हो जाता है 
खामोशी से यादों के 
सहारे ज़िंदा रहते हैं 
मौत का इंतज़ार में
डूबे रहते हैं 
क्यूं आये थे संसार में
निरंतर सोचते रहते हैं 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

14-02-2012
171-82-02-12

क्या सोचता होगा साज़?


क्या सोचता होगा साज़?
================
क्या सोचता होगा साज़?
जब खेलती नहीं ऊँगलिया उससे
बजाता नहीं कई दिनों तक उसे कोई 
निकालता नहीं सुर नया कोई
पौंछता नहीं जमी हुयी धूल कोई
पूँछता होगा सवाल खुद से
जवाब नहीं मिलता होगा कोई
उसी तरह बजता है निकालता है सुर वही
कई दिनों के बाद जब छेड़ता है उसे कोई
क्यों व्यथित हो जाता है मन
कई दिनों तक जब मिलता नहीं
हमें अपना कोई
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
14-02-2012
170-81-02-12

गुरुवार, 1 मार्च 2012

तूँ मुझसे खफा हो जाए


तूँ खफा हो जाए
मैं खामोश बैठा रहूँ
ये भी मुमकिन नहीं
तेरी नाराजगी पर
नाराज़ हो जाऊं
ये मुमकिन नहीं
तुझे खुश करने के लिए
तेरे पैरों में गिर जाऊं
ये भी मुमकिन नहीं
मुमकिन है तो सिर्फ
एक बात
तुझे गोद में उठा कर
ले आऊँ
नाराज़ ना करने की 
 कसम खा लूँ
तुझे फिर कभी
जाने ना दूं 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
14-02-2012
168-79-02-12

हास्य कविता-वैलनटाइन डे क्या ख़ाक मनाएंगे


हास्य कविता-वैलनटाइन डे  क्या ख़ाक मनाएंगे
====================
मित्रों ने पूछा
भाई निरंतर
वैलनटाइन डे 

कैसे मनाओगे?
भाभीजी को
बगीचे में घुमाओगे
नदी किनारे
ठंडी हवा खिलाओगे
या बाहों में बाहें डाल
गाना गाओगे
मैं बोला
अरे मूर्खों हम पहले ही
एक दूजे में खोये हुए हैं
हमारे दिल से
दिल मिले हुए हैं
वैलनटाइन डे
क्या ख़ाक मनाएंगे
वैलनटाइन डे
वो मनाते हैं
जो प्रेम के भूखे हैं
जिनके दिल आपस में
नहीं मिलते
शायद इसी बहाने
मिल जाएँ
वैलनटाइन डे उन्हें
हमेशा याद आये
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
14-02-2012
167-78-02-12

बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

चुप रह कर काम चलाऊंगा



तुम्हारी हर बात का
उत्तर देना आवश्यक नहीं
अगर उत्तर
पसंद नहीं आया तुमको
पलट कर तुम भी
कुछ कहोगे मुझको
सिलसिला बंद नहीं होगा
बहस में बदल जाएगा
दोनों तरफ त्योंरिया 
चढ़ेगी
अपनी अपनी बात को
सही ठहराने की होड़
मचेगी
बहस झगडे मैं बदल
जायेगी
रिश्तों की बली चढ़
जायेगी
नहीं चाहता 
छोटी सी बात
रिश्तों के टूटने का कारण 
 बन जाए
अब तय कर लिया
चुप रह कर काम 
चलाऊंगा
अपमान को सहने की
शक्ति बढ़ाऊंगा
13-02-2012
165-76-02-12

यूँ ही नहीं याद करते लोग कबीर,रहीम को


यूँ ही नहीं
याद करते लोग
कबीर,रहीम को
लिखना है तो
वो बात लिखो
जो सब को समझ
आ जाए
पढ़ा नहीं साहित्य
जिसने
वो भी समझ जाए
ऐसा लिखना पढ़ना
किस काम का
न जोड़ सके कोई
अपने जीवन से
न काम किसी के आए
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

13-02-2012
164-75-02-12

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

मुस्कारा कर बोली ,अब कोई ज़ल्दी नहीं


शाम के वक़्त
बरसात से
बचने के खातिर
गीले कपड़ों में
पेड़ के नीचे  खडी
हुयी थी
पानी की बूँदें बालों से
उतरते हुए
चेहरे को भिगो रहीं थी
हल्की सर्दी उसे कंपा
रही थी 
घर जाने की ज़ल्दी
सता रही थी
चेहरे पर परेशानी
साफ़ झलक रही थी
मुझसे उसे यूँ परेशाँ
देखा ना गया
पास जाकर पूंछा
कहो तो घर छोड़ दूं
हौले से
मुस्कारा कर बोली
अब कोई ज़ल्दी नहीं
यूँ लगा जैसे
उसकी हसरतें परवान
चढ़ गयीं
13-02-2012
163-74-02-12

गलती मेरी ही थी


बहुत दिन
बाद नज़र आयी
सुन्दर साड़ी
हाथों में हीरे की चूड़ियाँ
चमचमा रही थी
हँस हँस कर लोगों से
बातें कर रही थी
मगर चेहरे की चमक
धुंधली पड चुकी थी
सुर्ख लाल आँखें
अलग कहानी कह रही थी
रात भर सोयी ना थी
दिल की
हकीकत बता रहीं थी
बेवफाई की
कीमत चुका रहीं थी
हमें देखा तो पास आयीं
सर झुका कर
नम आँखों से बोली
मुझे माफ़ कर दो
गलती मेरी ही थी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर    

13-02-2012
162-73-02-12

बाल कविता-चुन चुन चिड़िया

चुन चुन चिड़िया
बोली एक दिन
मुनमुन गुडिया से
रंग बिरंगे पंख मेरे
नन्हे नन्हे पैर
छोटी सी है चौंच मेरी
मीठी मीठी बोली
घोंसले में रहती हूँ
जोड़ जोड़ कर
तिनका तिनका
मेहनत से
नीड़ बनाती हूँ
चुग्गा दाना मेरा
भोजन
कष्ट किसी को 
देती नहीं
भोजन खुद जुटाती हूँ
फुदक फुदक कर
चलती हूँ
गीत खुशी के गाती हूँ
स्वच्छंद आकाश में
उडती हूँ
चुन चुन चिड़िया
बोली एक दिन
मुनमुन गुडिया से

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
13-02-2012
161-72-02-12

सोमवार, 27 फ़रवरी 2012

पुरानी कहानी फिर दोहरा गया

बड़ी मुश्किल से
थमे थे आंसू
क्यूं कोई आकर
फिर रुला गया
खामोशी से
दिल थामे बैठा था
क्यूं बुझी आग
फिर भड़का गया
मुश्किल से खुद को
सम्हाला था
क्यों फिर कोई
ज़हन्नुम में पहुंचा गया
खुदा के नाम पर
वफाई की 
कसमें खाई थी 
क्यूँ फिर कोई
बेवफाई दिखा गया
हँसते हुए को फिर
 रुला गया
पुरानी कहानी फिर
दोहरा गया
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
12-02-2012
159-70-02-12