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शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

उसे खुदा का दर्ज़ा दे दूं




जब सूरज
थका मांदा सा
ढलने वाला हो 
पहाड़ों के पीछे
छुपने वाला हो
शाम धीरे धीरे
कदम बढ़ा रही हो
चेहरे पर 
मायूसी छाने लगे
उस वक़्त
अगर वो आ जाए
आँखों की 
चमक लौट जाए
चेहरा दमकने लगे
वो आगे बढ़ कर
 पलकों को चूम ले
मैं चाँद सितारों के
बीच पहुँच जाऊं
खुद को ज़न्नत का
फ़रिश्ता समझने लगूं
उसे खुदा का दर्ज़ा दे दूं
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
03-02-2012
101-11-02-12

कौन याद करता है ?

मेरी कुछ कवितायें
मेरी डायरी में दबी पडी हैं
ठीक वैसे ही जैसे 
अपने कई ज़मीन में 
दफनाये पड़े हैं
कुछ कविताओं की
कुछ पंक्तियाँ याद हैं
कुछ के कुछ शब्द
कुछ के केवल शीर्षक
मस्तिष्क पर जोर 
डालता हूँ 
तो कुछ और कविताएं 
याद आने लगती हैं
कुछ कवितायें ऐसी भी हैं
जो ह्रदय से निकली थी
बड़े मन से लिखी गयीं थी
पर याद ही नहीं आती
निरंतर सोचता हूँ
ऐसा क्यों होता है ?...
क्यूँ भूल जाता हूँ  ...
क्या इसलिए कि याद
करना  नहीं चाहता  
या  मैं बदल गया हूँ 
जो कभी ह्रदय का
हिस्सा होता था
अब याद भी नहीं आता
इतनी आसानी से
मनुष्य कैसे भूल जाता
ठीक उत्तर मिलता नहीं
तो अपने से कह देता हूँ
जो आज है
वो ही तो याद रहेगा
जो हो चुका या जा चुका
उसे कोई क्यों याद करेगा ?
किसे याद रहता
किसने किसके लिए
क्या करा ?
वैसे भी उगते सूरज को
सब नमस्कार करते हैं
जो चला गया
उसे कौन याद करता है ?
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
कविताएं.कविता,यादें,जीवन
02-02-2012
100-10-02-12

तुम्हें बदलना होगा ........

एक दफनाई हुयी
आवाज़ से कम नहीं
मेरी आवाज़
कितना भी चिल्लाऊं
कोई सुनता ही नहीं
निरंतर आवाज़ लगाता हूँ
अब तो बदल जाओ
इच्छा रखते हो
जैसा तुम चाहते हो
वैसा ही हो जाए
जो तुम कहो सब मान लें
पर तुम नहीं बदलोगे
किसी की नहीं सुनोगे
किसी की नहीं मानोगे
इतना स्वार्थ मत रखो
तुम चाहते हो
तुम्हारी भावनाओं का
ध्यान रखा जाए
तुम्हारी कामनाओं को
पूरा करा जाए
अपने ह्रदय से पूछों
यह कैसे
संभव हो सकता है ?
क्यों भूल जाते हो
कुछ पाने के लिए
कुछ देना पड़ता है
दूसरों की भावनाओं का
ध्यान रखना पड़ता है
उनकी बात को भी
सुनना पड़ता है
अब समय आ गया है
इच्छाओं को 
पूरा करना है तो 
ह्रदय के बंद कपाट को
खोलना होगा
हँसकर दूसरों को भी
सुनना होगा
उनकी भावनाओं का भी
सम्मान करना होगा
उन्हें गले लगाना होगा
तुम्हें बदलना होगा
        तुम्हें बदलना होगा .......
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
02-02-2012
99-09-02-12

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

कुछ शरमा गयी,कुछ घबरा गयी (हास्य कविता)


वो खडा था गली
के नुक्कड़ पर
उसको  देखा तो
कुछ शरमा गयी
कुछ घबरा गयी
दिल की धड़कन
बढ़ने लगी
चेहरे पर लाली
छाने लगी
सहमती हुयी बगल से
निकलने लगी
कनखियों से देखा
तो वो नहीं
उसकी सूरत से
मिलती जुलती सूरत
उसके भाई की थी
02-02-2012
97-07-02-12

मुकद्दर


हाल-ऐ-मुकद्दर
कैसे बयान करूँ
मुस्कारा कर रह
जाता हूँ
खुल कर हंस नहीं
सकता
सिसक कर रह
जाता हूँ
दर्द बयाँ कर नहीं
सकता
देख सकता हूँ
गले से लगा नहीं
सकता
आवाज़ सुन सकता हूँ
मिल नहीं सकता
दिल में रखता हूँ
कह नहीं सकता

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
01
-02-2012
96-06-02-12

मशविरा


एक मशविरा  
देता हूँ उनको
इतना भी ख्याल
ना रखें हमारा
गर कभी
नाराज़ हो गए
हमसे
कोई मनाने वाला
ना मिलेगा हमको 
उनके
माफ़ करने से पहले
जा चुके होंगे
दुनिया से
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
01-02-2012
95-05-02-12

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

मेरे दर्द को सुनता है कोई


वक़्त  के
 इस दौर में
जब कहने से 
फुर्सतनहीं किसी को 
खुशकिस्मत हूँ
मेरे दर्द को
सुनता है कोई
दूर से ही सही
हंसाता है कोई
ग़मों से निजात
ना दिला सके भले ही 
फिर भी टूटे दिल को
जोड़ता है कोई
सूखे दरिया में
पानी बहाता है कोई
ठहरी हुयी ज़िन्दगी में
रवानी लाता है 
कोई
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
01-02-2012
94-04-02-12

खुदा उनको खुश रखे


खुदा
उनको खुश रखे
जो बांटते हैं
खुशियाँ सबको
देते हैं हिम्मत
बढाते हैं होंसला
बदले में मांगते नहीं
कभी कुछ
रखते हैं हाथ कंधे पर
पोंछते हैं आंसूं
बंधाते हैं ढाढस
सुनते हैं सबकी
कान लगा के
खुद के गम
जुबां पर नहीं लाते

खुद से ज्यादा
दूसरों के लिए जीते
खुद खामोशी से
सहते रहते
खुदा
उनको आबाद रखे
जो बांटते हैं
खुशियाँ सबको
01-02-2012
93-03-02-12

बड़ी अजीब रात थी

बड़ी अजीब रात थी
इक तरफ चाँद की ठंडक
दूसरी तरफ उनके  
हुस्न की गर्मी
इक तरफ हमारी ख्वाईशें
दूसरी तरफ उनकी ना नुकर
रात यूँ ही बीत रही थी
ठंडी हवा भी कह रही थी
क्यों आगे ना बढ़ रहे हो
कब तक शरमाओगे 
इसी ज़द्दोज़हद में रात
गुजर गयी
हसरतें अधूरी रह गयीं
ना उन्हें ना हमें 
सुकून -ऐ-मोहब्बत 
मिल सका 
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
01-02-2012
92-02-02-12

बुधवार, 8 फ़रवरी 2012

हम बदल जायेंगे

नहीं बदलेंगे गर वो
फितरत अपनी
तो हम बदल जायेंगे
लाख रखें रंज हमसे
दें दें भरपूर बद्दुआए
मलाल नहीं रखेंगे
जी भर के रुलालें
हमको
हर बार आंसू पोंछ कर
फिर से हँसेंगे
मोहब्बत
ना छोड़ेंगे उनसे
वो ना बदलें भले ही
हम बदल जायेंगे
01-02-2012
91-01-02-12

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

रंग बिरंगी चिड़िया एक दिन बोली मुझसे


रंग बिरंगी चिड़िया एक दिन बोली मुझसे
=================
रंग बिरंगी चिड़िया 
एक दिन बोली मुझसे 
निरंतर खूब लिखते हो मुझ पर 
कभी मुझसे भी तो पूछ लो 
क्या लिखना है मुझ पर ? 
क्या सहती हूँ ? कैसे जीती हूँ ? 
कैसे उडती आकाश में ?
आज मैं ही सुनाती हूँ 
मेरी कहानी 
पहले ध्यान से सुन लो 
फिर जो मन में आये लिख लो 
पेड़ पर टंगे कमज़ोर से नीड़ में 
माँ ने अंडे को सेया 
तो मेरा जन्म हुआ
जीवन लेने को आतुर 
दुश्मनों से बचा कर 
किसी तरह माँ ने 
पाल पास कर बड़ा किया 
मुझे सब्र का पाठ पढ़ाया
जब तक खुद को 
सम्हाल नहीं सकूं तब तक 
उड़ने को मना किया
पहले फुदकना सिखाया 
कुछ अनुभव के बाद मुझे 
उड़ना सिखाया 
तिनकों से बने नीड़ में 
आंधी,तूफ़ान,
भीषण गर्मी और शीत में 
निरंतर जीवन जिया 
नीड कई बार उजड़ा 
माँ ने हताश हुए बिना 
हर बार अथक परिश्रम से
नया नीड बनाया 
सदा चौकन्ना रहने का 
महत्त्व बताया 
मुझे आत्म रक्षा का 
उपाय सुझाया 
अनुभव ना ले लूं जब तक 
नीड़ से दूर जाने को 
मना किया
माँ ने संतुष्ट रहना 
सिखाया
अपने सामर्थ्य के अनुरूप
जीने का मार्ग दिखाया 
माँ जो भी करती थी 
उन्होंने मुझे भी सिखाया
अब ,एक बात तुम से भी
पूछ लूं 
क्यों मनुष्य बच्चों को सब्र से 
जीने के लिए कहता 
परन्तु खुद बेसब्र रहता 
संतान से
संयम रखने को कहता 
खुद व्यवहार में उत्तेजित होता 
अनेकानेक कामनाएं
रखता 
पर निरंतर असंतुष्ट रहता 
संतान को भी असंतुष्ट बनाता
सदा अनुभव की बात करता 
स्वयं अनुभव हीन सा
काम करता 
अपने सामर्थ्य को नहीं
पहचानता 
सब कुछ पास होते हुए भी 
होड़ में जीता रहता
अति शीघ्र हताश हो जाता 
अगर लिखना ही है तो 
यह भी सब लिखना
मेरे रंग और सुन्दरत़ा पर 
सब लिखते हैं 
तुम से प्रार्थना है 
तुम तो मेरा सच लिखना
मेरे जीवन से कुछ
तुम भी सीखना  
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर"
31-01-2012
89-89-01-12

लम्हों का अहसास

रेस्तरां के
कोने में पडी मेज़
मेरी मुन्तजिर थी
रेस्तरां में कदम रखते ही
उम्मीद से मेरी तरफ
देखने लगती
वो मेरे साथ होंगी
मेज़ पर आ बैठेंगे
आँखों में आँखें डाल
घंटों एक दूसरे को
देखते रहेंगे
एक दूसरे की साँसों में
खुशबू घोलेंगे
कई वादे करेंगे
दिल नहीं मानेगा
फिर भी दोबारा
मिलने के लिए बिछड़ेंगे
उसे पता नहीं
अब वो दुनिया से
कूच कर गए
जाते जाते अपना
पता भी नहीं छोड़ गए
नहीं तो मेज की
ख्वाइश
उन तक पहुंचा देता
उसे ख्याल नहीं था
मैं अपनी यादों के
हँसी लम्हों का
अहसास करने के लिए
कौने में पडी मेज़ को
देखने के लिए
रेस्तरां में आता हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

31-01-2012
89-89-01-12

दिल टूट कर कुछ इस तरह बिखर गया

बेरहमी से
दिल से निकाला गया
उसकी मुस्काराहट  से
भरमाता रहा
निरंतर नए ख्वाब
बुनता रहा
हकीकत से बेफिक्र
उसके नशे में मदहोश
जीता रहा
खुद के लिए मौत का
सामान
इकट्ठा करता रहा
होश आया तो अकेले
खडा था
दिल टूट कर कुछ
इस तरह बिखर गया
सिवाय मौत के
कोई चारा भी ना था  
दफनाने  के लिए
कोई कंधा देने वाला भी  
बचा ना था
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
30-01-2012
88-88-01-12

सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

मदहोश

वो अपने हुस्न में
इतना मदहोश हैं
उन्हें ख्याल ही नहीं 
हम रोज़ ख़्वाबों में
उनसे मिलते हैं
उनसे गुफ्तगू करते हैं
हर जिस चीज़ के लिए
वो होश में ना करते हैं
ख़्वाबों में
खुद पहल करते हैं
हमारी हसरतों को
बड़े अंदाज़ से
अंजाम तक पहुंचाते हैं
30-01-2012
87-87-01-12

इक और रात फिर यूँ ही गुजर जाती

ख्याल मेरे
चेहरा उनका होता था
ख़्वाबों में निरंतर
उन्हें देखता 
उनसे बात करता
हाल-ऐ-दिल बयान
करता
वो बेखबर अदाएं
बिखेरती रहती 
मैं उन्हें दिल में
ज़ज्ब करता रहता 
हसरतें मचलने लगती 
सांसें तेज़ होने लगती 
हिम्मत भी बढ़ने लगती 
अरमानों की मंजिल पर
कदम रख लूं
उनका हाथ थाम लूं
उससे पहले ही नींद
टूट जाती
सौत बन कर
बीच आ खड़ी होती
बहारों की तमन्ना
खिजा में बदल जाती
इक और रात फिर
यूँ ही गुजर जाती
30-01-2012
86-86-01-12