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शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

खुदा की ये कैसी मर्जी है



खुदा की ये कैसी मर्जी है
ज़िन्दगी अज़ब मोड़ पर खडी है
इक तरफ खिजा का आलम
दूसरी तरफ बहार छा रही है
कभी लबों पर मुस्कान आती
कभी आँखें नम हो जाती है
कभी हँस हँस कर बातें होती
कभी जुबां लडखडाने लगती है
अब खुदा से सिर्फ एक अर्जी है
चाहे तो मुझ से हँसी छीन ले
आँखों की नमी भी साथ ले ले
मेरा सुकून मुझे वापस दे दे
इत्मीनान से जीने दे

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
26-01-2012
82-82-01-12

मेरी उम्मीदों को कायम रहने दें



 उनके घर के
करीब पहुँचते ही
दिल की
धडकनें बढ़ जाती
दिल में ज़ज्ब उम्मीदें
करवटें लेती
उनके घर की तरफ
निगाहें उठ ही जाती
वो नज़र आ जाए
देख कर मुस्कारा दें
मेरे अरमानो को
रफ़्तार दे दें
अगर गुरेज हो
उन्हें मुस्काराने से
तो बस मुझे देख लें
देखने से भी गुरेज हो
अगर उनको
तो मुझे ही जी भर के
देख लेने दें
मेरी उम्मीदों को
कायम रहने दें
मुझे इंतज़ार में
जीने दें
24-01-2012
79-79-01-12

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

हँसमुखजी थे थानेदार कड़क (हास्य कविता)

हँसमुखजी थे
थानेदार कड़क
एक जेबकतरे को
पकड़ लिया फ़टाफ़ट
देने लगे हाथ पैर
तोड़ने की धमकी
बता कितनी जेबें 
तूनें अब तक काटी
जेबकतरा भी था उस्ताद
कहने लगा
 मारना मत बड़े भैया
मार से
मुझे डर बहुत लगता
हँसमुखजी थानेदार का
पारा चढ़ गया
झट से जेबकतरे का गला
पकड़ लिया
फुफकारते हुए बोले
मारूंगा बाद में
पहले बता
तूनें भैया कैसे कहा
जेबकतरा मिमियाया
भैया बुरा मत मानना
चोर चोर मौसेरे भाई
हम काटते जेब उसकी
जिसकी
जेब में माल होता
आप किसी को नहीं
छोड़ते
गरीब हो या अमीर
चोर हो या साहूकार
जो भी चुंगुल में फंसता
वो पूरी तरह से कटता
जीवन भर आपकी
सूरत से भी घबराता
अब आप ही बताओ ,
हुए ना भाई भाई
आप बड़े मैं छोटा
24-01-2012
77-77-01-12

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

काव्यात्मक लघु कथा -विश्वास-अविश्वास-विश्वास


सर्द रात
फटे हुए कपड़ों में
सर घुटनों में छुपाए
सिसकियाँ ले कर
आंसू बहा रही थी
सर्दी में काँप रही थी
उस पर मेरी दृष्टि पडी
रोने का कारण
जानने की जिज्ञासा बड़ी
पास जाकर पूंछा
तो एक शब्द ना बोली
पहले से अधिक जोर से 
फफक फफक कर रो पडी
बार बार पूछने पर
विश्वास रखो
मदद करूंगा कहते ही
एकदम बिफर पडी
रोते रोते चिल्लाते हुए
पूरे आवेग से बोल पडी 
तुम भी कर लो
जो तुम्हें करना है
सब झूठ बोलते हैं
मुझे किसी पर विश्वास नहीं
पहले भी चार लोगों ने
मदद के बहाने
मुझे हवस का शिकार
बनाया
अब तुम भी मनमानी
कर लो
कहते कहते कांपते हुए
जमीन पर बैठ गयी
मुझे काटो तो खून नहीं
आगे एक शब्द भी नहीं
बोल सका
अपना कोट उतार कर
उसे ओढ़ा दिया
हाथ में पांच सौ का नोट
थमा दिया
भारी मन से  सोचता हुआ
घर की और चल दिया
कोई किसी की मजबूरी का
इतना फायदा कैसे उठा
सकता है?
उसका विश्वास शब्द  से ही
विश्वास उठ जाए 
हर व्यक्ति उसे हैवान
दिखाई देने लगे
तभी
पीछे से आवाज़ आयी
मुड के देखा तो
वो मेरे पीछे पीछे
चली आ रही थी
कहने लगी
बाबूजी मुझे माफ़ करना
आप पर विश्वास है
आपके पैसे वापस ले लो
सुबह से भूखी हूँ
पहले मुझे कुछ खिला दो
फिर मेरा इलाज
करवा कर
मुझे घर पहुंचा दो
मुझे  विश्वास नहीं हुआ
सोच में डूब गया 
अविश्वास
इतना शीघ्र विश्वास में
कैसे बदल गया ?
24-01-2012
76-76-01-12

आई लव यू ,गुड बाई की जगह बहन फिर मिलेंगे बोल बैठे (हास्य कविता)


आई लव यू ,गुड बाई की जगह बहन फिर मिलेंगे बोल बैठे (हास्य कविता)
===================
आज उन्हें
नाराज़ कर बैठे
हाई  हैलो की जगह
नमस्कार कर बैठे
खूबसूरत लग रही हो
कहना भूल बैठे
अध् ढके शरीर पर
पहने नए सूट
नयी घड़ी की
तारीफ़ करना भूल बैठे
असली उम्र से
छोटी लग रही हैं
कहने से चूक गए
उनके पसंदीदा
सैंट की महक को
अजीब बदबू आ रही है
कह बैठे
ज़ल्दबाजी में उनके
कद को सही नाप बैठे ,
उन्हें साढ़े चार फुट का
बता बैठे
अच्छा सोच रखने की
सलाह दे बैठे
जाते जाते संस्कारों पर
चर्चा कर बैठे
आई लव यू ,
गुड बाई की जगह
बहन फिर मिलेंगे
बोल बैठे
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
23-01-2012
73-73-01-12

बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

एक बार फिर हम पर तेज़ाब डाला गया



एक बार फिर  
हम पर 
तेज़ाब डाला गया
हम पर
लांछन लगाया गया
हमारे हृदय को
झुलसाया गया
चेहरे पर चेहरा चढ़ा
बताया गया
उन्होंने भी वही किया
जो अब तक लोगों ने किया
वही समझा जो
अब तक लोगों ने समझा
कसूर उनका नहीं
हमारी किस्मत का है
झुलसे चेहरे को छुपा कर 
रखने का गुनाह जो करते हैं
निरंतर हँसते रहते हैं
नए दोस्त बनाते हैं
उनसे गले लग कर मिलते हैं
साफ़ दिल का होते हुए भी 
मनों में शक पैदा करते हैं
शक ने दुनिया को मारा
हमको भी मार ले 
क्या फर्क पड़ता
झुलसे चेहरे पर
नया चेहरा चढ़ा लेंगे
मन में रोते रहेंगे
दिखाने को  हँसते रहेंगे

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
22-01-2012
72-72-01-12

“फिर कभी”

मेरे परम मित्र
दूसरे शहर में रहते
जीवन के विषयों पर
हम निरंतर
आपस में चर्चा करते
जब चर्चा
गूढ़ होने लगती
तो फ़ौरन कह देते
इसमें बहुत समय लगेगा
इस प़र “फिर कभी”
विस्तार से चर्चा करेंगे
मैं मन मसोस कर
रह जाता
धीरे धीरे विषयों की
सूची लम्बी होने लगी
मैं उन्हें याद दिलाता
तो कह देते
छोडो भी, 
आज तो जी भर कर 
बात कर लेने दो
“फिर कभी” मिलेंगे
जब ऐसे गहरे विषय पर
विस्तार से चर्चा करेंगे
सिलसिला चलता रहा
चर्चाओं का दौर चलता रहा
उनका “फिर कभी” कहना
भी चलता रहा
पर किसी विषय पर
चर्चा पूरी नहीं हो सकी
आज मैंने उनकी
“फिर कभी” कहने की
आदत छुडाने के लिए
उनसे कह दिया
आज चर्चा पूरी करो
या “फिर कभी” बात
मत करो
तो वो सहजता और
भोलेपन से बोले
कैसी बात करते हो,
तुम तो
ह्रदय के बहुत अच्छे हो
तुम मुझसे बात करना
 बंद कर ही नहीं सकते
हमारे तो मन भी
मिलते हैं
क्रोध “फिर कभी”
बाद में कर लेना
आज तो
प्यार से दो बात कर लो
मैं उनकी
बात टाल नहीं सका
प्रसन्नता से
 बात चीत करने लगा
आदत छुडाने के 
विषय में बात आयी
तो फिर कहने लगे
लंबा विषय है
“फिर कभी” विस्तार से
चर्चा करेंगे
मैं  चुपचाप सुनता रहा,
फिर मुस्कराकर
रह गया
21-01-2012
71-71-01-12

मंगलवार, 31 जनवरी 2012

मेरे शहर में जब आंधी आती

सोमवार, 30 जनवरी 2012

ना कहना कभी .....


ना कहना कभी
पल पल तुम्हें याद
ना करूँ
जहन से तुम्हारा
नाम मिटा दूं
तुमने ही
मुझे होंसला दिया
जीने का तरीका
सिखाया
रोते चेहरे को
फिर से हंसाया
क्या दिल से चाहोगे
फिर से टूट कर इतना
बिखर जाऊं
कि दोबारा सिमट
ना सकूं
रोना भी चाहूँ तो रो
ना सकूं
जीते जी मर जाऊं
ना कहना कभी
तुम्हारा नाम भी
ना लूं
पल पल तुम्हें याद
ना करूँ
20-01-2012
68-68-01-12

नहीं चाहता तूँ बदनाम हो जाए

अपने अक्स को
बहुत सम्हाल कर
रखता हूँ
चाहता नहीं हूँ
जिस तरह मैं टूट गया
उस तरह मेरा अक्स
भी टूट जाए
दिल बाहर निकल कर
बिखर जाए
उस पर लिखे तेरी
बेवफायी के किस्से
दुनिया को पता चल जाए
निरंतर
दिल से चाहा तुझ को
नहीं चाहता
तूँ बदनाम हो जाए
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

19-01-2012
67-67-01-12

रविवार, 29 जनवरी 2012

सोना तो सोना ही रहेगा

वक़्त की मार से
काला पड़ गया
मिटटी में दबा हुआ
लोहे का टुकडा
सदा सोचता था
कोई उसे मिटटी से निकाले
झाड पोंछ कर फिर से
काम आने लायक बना दे
किस्मत ने
उसे चमकते सोने का
साथ दे दिया
सोने का साथ मिलते ही
लोहा चमकने लगा
भ्रमित हो गया
अपने को
सोना समझने लगा
सपनों की
दुनिया में खोने लगा
राह से भटकने लगा  
निरंतर सोने का सानिध्य
चाहने लगा
भूल गया था
सैकड़ों हथोड़े खाया हुआ
कई बार तपाया गया
लोहे का टुकडा था
सोने के साथ कितना भी
चमक जाए 
लोहा ही रहेगा
एक दिन उसने सुन लिया
कोई कह रहा था
लोहा सोने के साथ
क्या कर रहा
तुरंत उसे याद आया
वो मात्र लोहे का टुकडा था
सोना तो सोना ही रहेगा
निरंतर चमकता रहेगा
जिसे के भी साथ रहेगा
उसकी कीमत बढ़ाएगा
सोच विचार के बाद
विनम्रता से सोने से बोला
मुझे भूलना नहीं
निरंतर साथ निभाना
दूर से ही सही
अपनी चमक से
नहलाते रहना 
ज़िन्दगी के हथोडों से
बचने का तरीका बताते रहना
कभी पथ से ना डिगने देना
मंजिल तक पहुंचाना
फिर से 
किसी लायक बन कर
किसी के काम आऊँ
ऐसी हिम्मत देते रहना 
अपना स्नेह बनाए
रखना
19-01-2012
65-65-01-12