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शनिवार, 28 जनवरी 2012

दिल ने जिसे भी चाहा



दिल ने
जिसे भी चाहा
वो जुदा हो गया
नहीं कहता
मैं तनहा हो गया
मेरा खुदा मेरे साथ रहा
दिल निरंतर
उसे याद करता रहा
इतना ज़रूर है
दिल को राहत
मुझे सुकून नहीं
उम्मीद फिर भी
खोयी नहीं
वो भी याद तो
करता होगा
दो कतरे आंसू  के
बहाता होगा
अपने खुदा से भी
डरता होगा
खुदा के
खौफ से ही सही
कभी तो लौट कर
आयेगा
हसरतों के बगीचे में
बहार बन कर
छाएगा
मोहब्बत की
किश्ती को किनारे
लगाएगा
19-01-2012
63-63-01-12

दिल किस के बस में है



दिल
किस के बस में है
अब तक पता नहीं चला
ज़िन्दगी क्यों बेबस है
ये भी पता नहीं चला
कोई तो है
जिस की चाह में
ना अब तक मन लगा
ना सुकून मिला
कहाँ छुपा है ?
कब मिलेगा ?
ये भी नहीं पता
इंतज़ार में ज़िंदा हूँ
उम्मीद में जीता हूँ
कोई तो है
इतना ज़रूर पता है
19-01-2012
62-62-01-12

शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

क्यों मिलता फिर बिछड़ता कोई


क्यों मिलता फिर बिछड़ता कोई
===========
जितना
याद करता हूँ
उतना ही 
ख्यालों में खोता हूँ
भावों के भंवर में
गोता लगाता हूँ
अतीत की नदी में
अविरल बहता हूँ
ह्रदय का स्पंदन
मन की उलझन
बढाता हूँ
निरंतर सोचता हूँ 
क्यों मिलता
फिर बिछड़ता कोई
उत्तर की प्रतीक्षा में
जीता जाता हूँ
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
19-01-2012
60-60-0112
यादें,जीवन,बिछड़ना.

क्यूं हद से गुजर जाते हैं हम ?



गुजर जाते हैं हम ?
रिश्तों की हद को
लांघ जाते है हम
तहजीब की हदें पार
कर जाते हैं हम
खुद की रज़ा को
दूसरों की रज़ा समझ
लेते हैं हम
जाती ज़िन्दगी पर
सवाल करते हैं हम
जाती लम्हों में
घुसपैठ करते है हम
क्यों रिश्तों को ठीक से
नहीं निभाते हैं हम
छोटी छोटी बातों को
तूल देते हैं हम
दूरियों के लिए
खुद को ज़िम्मेदार
मानते नहीं हम
क्यूं हद से गुजर
जाते हैं हम ?
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
19-01-2012
59-59-01-12

गुरुवार, 26 जनवरी 2012

दबे है दिल में दर्द बहुत


दबे है 
दिल में दर्द बहुत
खाए हैं ज़ख्म
अपनों से बहुत
जब भी मिलते हैं
गले लग कर मिलते हैं
फिर चुपके से वार
करते हैं
खुश हैं की ज़िंदा हैं
अब तक हम
अब भी उनसे
हंस कर मिलते हैं हम
घबराते नहीं कब फिर
ज़ख्मों से नवाज़ंगे
पहले भी सहे हैं
फिर सह लेंगे
निरंतर हँसते रहेंगे
लाख कोशिश कर लें
रोयेंगे नहीं हम
हिम्मत से लड़ते रहे हैं 
हिम्मत से 
लड़ते रहेंगे हम 
मोहब्बत से जीने की 

फितरत नहीं बदलेंगे हम
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
17-01-2012
55-55-01-12
E

मेरे पैरों का दर्द



मेरे पैरों का दर्द
दिन रात मुझे 
विचलित करता   
पर मेरे पैरों का
कोई दोष नहीं इस में
उन्होंने तो जीवन भर
मेरा साथ दिया 
निरंतर मेरा बोझ ढ़ोया
मुझे उठाया,बिठाया,
सड़क पर चलाया
पहाड़ पर चढ़ाया
खिलाया,कुदाया
नया गाँव,नया शहर
दिखाया
कभी किसी का
सहारा नहीं लेने दिया 
मैंने भी उनपर
अत्याचार कम नहीं किया
आवश्यकता से अधिक
उनको काम में लिया
अब बेचारे दर्द करते
चैन से नहीं रहने देते  
तो उन्हें कैसे दोष दूं ?
भूल गया हूँ
बिना दर्द के पैर कैसे
होते हैं ?
अब दर्द के साथ जीता हूँ
खुशी से सहता हूँ
समझता हूँ
मेरे पैरों के अहसानों का
बदला चुका रहा हूँ
17-01-2012
54-54-01-12

कोई ज्यादा हँसता



कोई ज्यादा हँसता 
तो अजीब सा लगता
जहन में ख्याल आता
वाकई खुश है या
गम पी पी कर के
दिखाने को हंस रहा
या फिर मेरे ग़मों का
मज़ाक बना रहा
मैं भी क्या करूँ
जिधर नज़र उठाता हूँ
कोई खुश नज़र
नहीं आता
हर शख्श ग़मों का
बोझ लेकर जीता
दिखता
निरंतर चेहरे पर
चेहरा लगाए
दिखता
17-01-2012
53-53-01-12

वो आज फिर

वो आज फिर नज़रें
झुकाए
मेरे घर के सामने से
निकल गयी
डर रही थी
मेरी नज़रों से उसकी
नज़रें जो मिल गयी
ज़िन्दगी भर के लिए
क़ैद हो जायेगी
शायद उसे
मेरी चाहत का पता
नहीं था
मैं बैठा सोच रहा था
उसकी नज़र गर मेरी
नज़र से मिल गयी
उसकी आँखों का
काजल बन
ज़िन्दगी भर के लिए
उसकी आँखों में बस
जाऊंगा
मझधार में फंसी
किश्ती को किनारे
लगा दूंगा
17-01-2012
51-51-01-12

बुधवार, 25 जनवरी 2012

चेहरों पर कभी ना रीझना



चेहरा कभी
सच नहीं बताता
भेड़ की खाल में
भेड़िया छुपा होता
चेहरों पर
कभी ना रीझना
कौन चोर
कौन साहूकार
पता नहीं चलता
निरंतर विश्वास में ही
विश्वासघात होता
सफ़ेद झूठ
काले झूठ से ज्यादा
खतरनाक होता
सच,झूठ के फैसले में
ज़ल्दी ना करना
अनुभव से काम में लेना
सफ़ेद पोशों से 
बच कर रहना
धोखा उनसे ही 
ज्यादा होता
चेहरों पर कभी ना
रीझना
चेहरा कभी
सच नहीं बताता

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
17-01-2012
50-50-01-12