ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

शनिवार, 21 जनवरी 2012

अनुभव और उम्र का रिश्ता क्या है ?

उम्र के प्रश्न ने
सदा झंझोड़ा मुझको
समझ नहीं पाता
क्यों उसे
अनुभव से जोड़ा जाता
अब तक जीवन में
छोटी उम्र के 
बड़ों को देखा
उन्हें अनुभव से
सरोबार देखा
बड़ी ऊम्र के छोटों को
भी देखा
उनकी कथनी,करनी में
छिछोरेपन को झांकते
देखा 
मैं नहीं मानता
अनुभव सदा उम्र से
ही आता
नहीं जानता
अनुभव और उम्र का
रिश्ता क्या है ?
समझता हूँ
सोच मनुष्य को
छोटा बड़ा बनाता
सार्थक अनुभव के लिए
जीवन को करीब से
देखना आवश्यक
दिल और दिमाग के
दरवाज़े खुले रखना
दूसरों से सीखना
आवश्यक
अब अपना
सोच बदल डालो
उम्र को अनुभव से
जोड़ना छोड़ दो
जिनके भी विचार
परिपक्व हैं 
कम उम्र में भी उन्हें
बड़ा समझो
ह्रदय से सम्मान दो
उम्र से अनुभव का
ठेका वापस ले लो
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर"
14-01-2012
41-41-01-12

कई बार हँसा हूँ , कई बार रोया हूँ

कई बार हँसा हूँ
कई बार रोया हूँ
कई बार जला हूँ
कई बार बुझा हूँ
चोट खाता रहा हूँ
सहता रहा हूँ
फिर भी जीता
रहा हूँ
किस्मत से लड़ता
रहा हूँ
टूटा हूँ मगर थका
नहीं हूँ
नाउम्मीद अब भी
नहीं हूँ
अब भी नए लोगों से
मिलता हूँ
नए दोस्त बनाता हूँ
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर"
14-01-2012
40-40-01-12

शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

ना जाने कितने मौसम बदलेंगे





ना जाने
कितने लोगों से
कितनी
मुलाकातें बची है?
न जाने कितने दिन
कितनी रातें बची  हैं?
ना जाने कितना रोना
कितना सहना बचा है?
कब बंद हो जायेंगी आँखें
किस को पता है?
ना जाने कितने मौसम
बदलेंगे
कितने फूल खिलेंगे?
कब उजड़ेगा बागीचा
किस को पता है?
ना जाने कितनी सौगातें
मिलेंगी?
बह्लायेंगी या रुलायेंगी
किस को पता है?
जब तक जी रहा
क्यों फ़िक्र करता निरंतर
ना तो परवाह कर
ना तूँ सोच इतना
जब जो होना है हो
जाएगा
जो मिलना है मिल
जाएगा
तूँ तो हँसते गाते जी
निरंतर
जो भी मिले
उससे गले लग कर
मिल निरंतर
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
12-01-2012
38-38-01-12

पर्दाफ़ाश


हम कर रहे थे
इंतज़ार उनका
वो देख कर भी
अनदेखा कर रहे थे
निरंतर
छुपने की कोशिश में
परेशाँ हो रहे थे
उन्हें पता नहीं था
उनकी महक ने हमें
उनकी मौजूदगी के
बारे में बता दिया था
उनकी कोशिश का
पर्दाफ़ाश
कर दिया था
12-01-2012
36-36-01-12

गुरुवार, 19 जनवरी 2012

काले दुपट्टे में


अमावस की रात को
काले दुपट्टे से ढके चेहरे में 
वो पूनम के चाँद सी
दिख रही थी
आँखों को यकीन नहीं
हो रहा था
चाँद करीब से देखने पर
इतना खूबसूरत होता है
आँखें बंद होने का
नाम नहीं ले रही थी
दिल करने लगा उसे
देखता ही रहूँ
दो बात करूँ
तभी उसने दुपट्टे से मुंह
ढक लिया
अन्धेरा छा गया
लगा चाँद छुप गया
थोड़ी देर
इंतज़ार करता रहा
गौर से देखा तो
सामने कोई नहीं था
उजाले को फिर
अँधेरे में बदल कर
वो जा चुकी थी
मैं फिर उजाले की
तलाश में निकल पडा
तब से अब तक भटक
रहा हूँ ,
उजाले को ढूंढ रहा हूँ
11-01-2012
32-32-01-12

गृहणी पर कविता- हाउस वाइफ का सुख दुःख हाउस वाइफ ही जाने

हाउस वाइफ का दुःख
हाउस वाइफ ही जाने
आज ससुर तो कल
सास बीमार
ससुर को डाक्टर के 
पास ले जाना है 
सास को बैद जी को 
दिखाना है
मंदिर से लेकर
अस्पताल तक साथ 
निभाना है
पति का सिर दुःख रहा
सिर पर बाम लगाना है
बेटा खांस रहा है 
शरीर गर्म हो रहा है 
उसे हल्दी मिला दूध
पिलाना है
चिडचिडा हो रहा है
इसलिए पास भी
बैठना है 
स्कूल जाकर छुट्टी के लिए
कहना है
गैस ख़त्म हो गयी
कब आयेगी पता नहीं
तब तक पड़ोसी से 
मांग कर काम चलाना है
काम वाली बाई आज 
आयी नहीं
पर खाना तो बनाना है
बर्तनों को साफ़ करना है
मुंबई से नंदोई आये हैं 
दो चार दिन उनका 
सत्कार करना है
साथ में शहर दर्शन भी
कराना है
कमी रह जायेगी तो
महीनों सुनना पडेगा
छोटी बहन का फ़ोन आया
ससुराल में विवाह है
शौपिंग के लिए
बाज़ार साथ जाना है
दफ्तर से पती का फ़ोन
आया है
रात को अफसर का खाना है 
बढ़िया से बढ़िया
इंतजाम करना है
इज्ज़त का झंडा ऊंचा
रखना है
जेठ जी का फ़ोन आया
कल सवेरे की गाडी से आयेंगे 
पतिदेव तो दफ्तर जायेंगे
इसलिए स्टेशन से लाना है
आज करवा चौथ का व्रत है
भूखे पेट भजन नहीं होता
हाउस वाइफ को घर तो
चलाना है
खुद का बदन दुखे या पेट
खाना तो बनाना है
छोटी छोटी बात का भी
ख्याल रखना है
माँ,बहु,भाभी,पत्नी का
धर्म भी निभाना है
सब को खुश जो रखना है
मन करता थोड़ा अपने
मन का कर ले
इतने में कोई घंटी बजाता है
दरवाज़ा खोला तो सामने
पड़ोसी खडा है
पत्नी की तबियत ठीक नहीं
अस्पताल साथ जाना है
इतना कुछ करती है
फिर भी 
ज़िंदगी भर सुनना 
पड़ता है
दिन भर करती 
क्या हो
तुम्हें कितना आराम है
काम के लिए तुम्हें
दफ्तर नहीं जाना पड़ता
कैसे समझाए किसी को?
निरंतर खटते खटते उम्र
गुजर जाती है
हर दिन दूसरों के लिए 
जीती है 
फिर भी ज़िन्दगी भर
केवल हाउस वाइफ
कहलाती है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
10-01-2012
29-29-01-12

बुधवार, 18 जनवरी 2012

खुद का युद्ध


कोई कितनी भी
हमदर्दी जता दे
कंधे पर हाथ रख दे
साथ में आंसू बहा ले
कोई काम नहीं आता
खुद का दर्द
खुद को ही सहना
पड़ता
भाग्य से खुद को ही
जूझना पड़ता
जीवन के थपेड़ों को
खुद ही सहना पड़ता
खुद का युद्ध खुद को ही
लड़ना पड़ता
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर", 
10-01-2012
28-28-01-12

उनकी ख़ूबसूरती में

वो ख्यालों में 
डूबी हुयी
सुनहरी धूप में
गीले बाल सुखा 
रही थी
धूप बालों से कुछ
इस तरह
छन कर रही थी
मानों लुका छुपी खेल
रही हो
साथ ही कह रही हो
मेरा रास्ता मत रोको
घने लम्बे नर्म काले
बालों को
पूरी तरह से नहलाने दो
उनकी ख़ूबसूरती में
सरोबार होने दो
10-01-2012
27-27-01-12

अपना जन्म दिन मनाओ

खूब
खुशियाँ मनाओ
अपना जन्म दिन
मनाओ
क्षण भर के लिए भी
मन में विचार मत लाओ
एक वर्ष कम हो गया
तुम्हारे जीवन का
सोचना है तो सोचो
बढ़ गया अनुभव
तुम्हारा
पहले से आसान होगा
मुश्किलों से लड़ना
दे सकोगे छोटों को
सीख अपने अनुभव से
गलतियां सुधारोगे
पहले से बेहतर करोगे
और बढोगे आगे को
खूब खुशियाँ मनाओ
अपना जन्म दिन
मनाओ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
10-01-2012
26-26-01-12

मंगलवार, 17 जनवरी 2012

हक है तुम्हें


हक है तुम्हें
शक से देखो हमें
तुम्हारे ख्यालों पर
कोई गिला नहीं हमें
गलती तुम्हारी नहीं
तुमने देखे ही नहीं
साफ़ दिल के लोग कभी
खाई है
चोट अपनों से बहुत
परायों पर
ऐतबार कैसे करोगे
शक करना मजबूरी
तुम्हारी  
क्यूं हम पर शक ना
करोगे?
10-01-2012
25-25-01-12

सोमवार, 16 जनवरी 2012

कैसे बताऊँ क्या है दिल में तुम्हारे लिए?

कैसे बताऊँ क्या है
दिल में तुम्हारे लिए?
कैसे कहूं
क्या मिलता है मुझे
तुमसे गुफ्तगू कर के?
क्यों तुम्हारा नाम आता है ?
जहन में बार बार
न तुम माशूक मेरे
ना मैं आशिक तुम्हारा
फिर भी मन नहीं मानता
खामोश रहने के लिए
कैसे समझाऊँ?
कुछ तो
मिलता होगा तुमसे
जो मिला नहीं मुझे
अभी तक अपनों से
दिल रोता रहा अब तक
जिसको पाने के लिए
कोई तो है
जो समझता है मुझ को
ऐसा अहसास होता है
दिल को सुकून 
ज़ज्बातों को मुकाम
मिलता है
रिश्ता पिछले जन्म का
लगता है
अकेला नहीं हूँ ऐसा
लगता है
कैसे बताऊँ क्या है
दिल में तुम्हारे लिए?
10-01-2012
24-24-01-12

हँसमुखजी थे पान के शौक़ीन (हास्य कविता)

हँसमुखजी थे
पान के शौक़ीन
खाते थे
पांच मिनिट में तीन
पीक से भर कर
मुंह हो जाता गुब्बारा
होठ हो जाते लाल
कर रहे थे बात दोस्त से
ध्यान था कहीं ओर
किस्मत थी खराब 
पूरे जोर से मारी
उन्होंने पीक की पिचकारी
बगल से जा रही थी
एक भारी भरकम नारी
पीक पडी उसकी साड़ी पर
महिला गयी भड़क
पहले तो दी गालियाँ
फिर चप्पल लेकर दौड़ी
डरते डरते हँसमुखजी ने
दौड़ लगाई सरपट
पैर पडा केले के छिलके पर
फ़ौरन गए रपट
महिला ने भी दे दना दन
मारी चप्पल पर चप्पल
कर दिया मार मार कर
हाल उनका बेहाल
हाथ जोड़ कर पैर पकड़ कर
 माफी माँगी
और छुड़ाई जान
कान पकड़ कर कसम खाई
जीवन भर अब नहीं
खाऊंगा पान
09-01-2012
21-21-01-12

रविवार, 15 जनवरी 2012

नहीं जानता मैं चाहता क्या हूँ ?

नहीं जानता
मैं चाहता क्या हूँ
नए लोगों से मिलता हूँ
उन्हें अपना बनाना
चाहता हूँ 
पुरानों को अपने साथ
रखना चाहता हूँ
नए जब पुराने हो जाते
चेहरे साफ़ दिखने लगते
मुझे सवालों से घेरते
सच कह देता हूँ
सच पूछ लेता हूँ
चेहरे से पर्दा हटाने की
कोशिश में मुझसे
रुष्ट हो जाते हैं
खुद से लड़ता हूँ
खुद को समझाता हूँ
कैसे अपने साथ रखूँ
निरंतर सोचता हूँ
जितना मनाता हूँ
उतना ही दूर होता
जाता हूँ
असली चेहरे को
पहचाने लगता हूँ
नहीं जानता
मैं चाहता क्या हूँ
07-01-2012
20-20-01-12

मुझे हक तो नहीं फिर भी नाराज़ हूँ


मुझे हक तो नहीं
फिर भी नाराज़ हूँ
तुमसे
रिश्तों की दुहाई दूं
साथ गुजारे वक़्त की
याद दिलाऊँ
वजह कुछ भी हो
तुम जानती हो तुम्हारी
बेरुखी वाजिब नहीं
मेरी वफाई पर कोई
दाग नहीं
तुमने ही उकता कर
किनारा कर लिया
इलज़ाम बेरुखी का
लगा दिया
ये भी ना सोचा
तुम्हारे खातिर ही 
खामोश रहते थे हम
बदनाम ना हो जाओ
मिलने की कोशिश नहीं
करते थे हम
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर"
07-01-2012
19-19-01-12