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शनिवार, 14 जनवरी 2012

दिन बदला,तारीख बदली

दिन बदला 

तारीख बदली  

ना धूप बदली ना ही 

हवा बदली 

ना ही सूरज,चाँद बदला 

ज़िन्दगी भी नहीं 

बदलती 

कभी होठों पर हंसी 

कभी आँखों में 

नमी होती 

निरंतर नए रंग रूप 

में आती 

आशा निराशा के 

भावों से 

अठखेलियाँ करती 

चैन की उम्मीद में 

बेचैनी पीछा नहीं 

छोडती

07-01-2012
18-18-01-12

शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

मत पूछो मुझ से मेरे दिल के अफ़साने

मत पूछो हम से
हमारे दिल के अफ़साने
करी नहीं मोहब्बत 
जिसने कभी 
वो दर्द- दिल क्या जाने
ना जानते ना पहचानते 
फिर भी मुस्करा कर 
देखा उन्होंने
खिला दिए मोहब्बत के
फूल दिल में
दिखा दिए ख्वाब रातों में
क्या कह रही दुनिया
हम बेखबर इस से
हो गए उनके दीवाने
कब मिलेंगे,पास बैठेंगे
बातें करेंगे,
मस्ती में झूमेंगे
इस ख्याल में 
अब डूबे हैं हम
कोई कहेगा
बीमार--इश्क हैं
क्या होता है इश्क 
जिसने किया वो
ही जाने
कब बुझेगी आग 
दिल की
अब खुदा जाने
हमें तो जीना है 
इंतज़ार में उनके 
आयेंगे या नहीं 
ये वो ही जाने

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  
06-01-2012
17-17-01-12

E

उसूलों पर चलता हूँ



इमानदारी से जीता हूँ
झूठ नहीं बोलता हूँ
उसूलों पर चलता हूँ 
कुछ मुझे धरती से
जुडा हुआ कहते
एक अच्छा
इंसान समझते
कुछ मेरी
इमानदारी पर
शक करते
मेरे उसूलों को
ढकोसला कहते
मुझे परवाह नहीं
कौन क्या कहता ? 
मुझे तो 
निरंतर परमात्मा के
उसूलों पर चलना है
इंसान बन कर जीना  है
अच्छा लगे या बुरा
किसी के कहने से
अपना सोच नहीं
बदलना है 
06-01-2012
16-16-01-12

अब क्यों पहचानेगा कोई मुझको?


अब क्यों पहचानेगा
कोई मुझको
सब चढ़ गए सफलता की
सीढ़ियों पर सीढियां
सहारा ले कर पहुँच गए
इतनी ऊंचाई पर
दिखता नहीं कोई उन्हें
वहां से
मैं जहां था वहीँ खडा हूँ
अब भी हाथ वैसे ही
बढाता हूँ
जिसे लेना है जी भर कर
ले ले सहारा मेरा
निरंतर
सफलता की सीढियां
चढ़ता जा
आकाश कीऊचाइयों को
छूता जा
याद करे तो फितरत
उसकी
नहीं करे तो इच्छा
उसकी
बस इतना सा याद
रख ले
उतरेगा जब भी नीचे
कोई ना पहचानेगा उसे
रोयेगा तो भी
कंधे पर हाथ नहीं
रखेगा
कोई उसके
06-01-2012
15-15-01-12

गुरुवार, 12 जनवरी 2012

समाधान

वर्षों से 
 शमशान में खडा
बरगद का विशालकाय पेड़
आज कुछ व्यथित था
मन में उठ रहे 
प्रश्नों से त्रस्त था
विचार पीछा ही नहीं
छोड़ रहे थे
क्रमबद्ध तरीके से
चले आ रहे थे
क्यों उसका जन्म
शमशान में हुआ?
यहाँ आने वाला
हर व्यक्ति केवल जीवन
म्रत्यु और वैराग्य की
 बात ही करता
कोई खुशी से
उसके पास नहीं आता
उसकी छाया में
कोई सोना नहीं चाहता
ना ही आवश्यकता से
अधिक रुकना चाहता
उसे निरंतर मनुष्यों का
क्रंदन ही सुनना पड़ता
रात में मरघट की शांती
उसे झंझोड़ती रहती
नहीं चाहते हुए भी
राख के ढेर में कुत्तों को
मानव अवशेष ढूंढते
देखना पड़ता
क्यों उसे जीने के लिए
शमशान ही मिला ?
क्या वो भी मनुष्यों जैसे
पिछले जन्म के
अपराधों की सज़ा काट रहा?
क्यों उसके भाग्य में एकाकी
नीरस जीवन जीना लिखा है ?
निरंतर उदास चेहरों को देखना
उनकी दुःख भरी बातों को
हर दिन रोने बिलखने की
आवाज़ सुनना ही
उसके जीवन का सत्य है
तभी उसे नीचे बैठे वृद्ध
साधू की आवाज़ सुनायी दी
वो किसी को कह रहा था
परमात्मा ने जो भी दिया
जैसा भी दिया
जितना भी दिया
उसे शिरोधार्य करना चाहिए
निरंतर संतुष्ट रहने का
प्रयास करना चाहिए
जब तक जीना है
खुशी से परमात्मा की
इच्छा समझ जीना चाहिए
व्यर्थ ही दुखी होने से
जीवन सुखद नहीं होता
उलटे अवसाद को
निमंत्रण मिलता
जीवन
कंटकाकीर्ण हो जाता
बरगद को उसके प्रश्न का
उत्तर मिल गया
उसकी व्यथा का
समाधान हो गया
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
                           05-01-2012
                             14-14-01-12

बुधवार, 11 जनवरी 2012

ज़ज्बातों को कैसे छुपाऊँ?

कैसे ज़ज्बातों को
छुपाऊँ?
कैसे दिल की आग
बुझाऊँ
कैसेचाहत को सीने में
दबा कर  रखूँ?
कैसे ख्यालों के
समंदर को
उफनने से रोकूँ?
क्यों उनसे
ख्वाबों में ना मिलूँ?
कैसे हसरतों को
मचलने  ना दूं?
क्यूं ना उनसे ही
पूछ लूं?
ज़रिये नज़्म
हाल-ऐ-दिल बता दूं
या तो वो समझ जायेंगे
ज़रिये पैगाम
अपनी रज़ा बता देंगे
नहीं तो मोहब्बत पर
एक और नज़्म
समझ कर पढ़ लेंगे
अरमानों को ठंडा कर देंगे
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
03-01-2012

12-12-01-12

लोग क्या कहेंगे ?


बड़े मन से
पसंद के कपडे का 
कोट सिलवाया
पहन कर 
यार दोस्तों के बीच
पहुँच गया
आशी थी सब कोट की
प्रशंसा करेंगे
मेरी पसंद की दाद देंगे
किसी ने प्रशंसा में
एक शब्द भी नहीं कहा
उलटा एक मित्र ने,
कोट को पुराने तरीके का
बता दिया
मन खिन्न,आशाओं पर
तुषारा पात हो गया
घर लौटते ही उसे 
अलमारी में टांग दिया
तय कर लिया
अब उसे कभी नहीं पहनूंगा
जो पैसे खर्च हुए,उन्हें भूल
जाऊंगा
साल भर कोट अलमारी में
टंगा रहा
सर्दी आने पर अलमारी खोली
 कोट नज़र आया 
समारोह में जाना था
मन ने कहा तो
फिर उसे पहन लिया
समारोह में पहुँचते ही
कोट को भूल गया
मुझे यकीन नहीं हुआ
जब किसी ने कहा
आपने बहुत सुन्दर कोट
पहना है  
फिर एक के बाद एक
कई लोगों ने कोट की
प्रशंसा करी
मन खुश हो गया
तय कर लिया
अब हर समारोह में
इसी कोट को पहनूंगा
घर लौटते समय सोचने लगा
एक व्यक्ति ने कोट की
हँसी उडाई
तो मैंने उसकी बात को
ह्रदय में उतार लिया
कोट को मन से उतार दिया
आज कुछ लोगों ने कोट की
प्रशंसा करी
तो गर्व से सीना फूल गया
क्यों थोड़ी सी प्रशंसा
सर पर चढ़ती ?
छोटा सा कटाक्ष बुरा
लगता
क्यों हम लोगों के कहने को
इतना महत्व देते ?
अपनी पसंद को
किसी के कहने भर से
छोड़ देते
ऐसे जीवन का क्या अर्थ?
जिसमें मनुष्य
मन की इच्छा से
कुछ नहीं कर सकता
सदा लोग क्या कहेंगे कि
चिंता में डूबा रहता
अनमने
भाव से जीता जाता

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
03-01-2012
11-11-01-12

मंगलवार, 10 जनवरी 2012

सोच


स्वछन्द आकाश में
विचरण करने वाली
पिंजरे में बंद कोयल
अब इच्छा से कूंकती
भी नहीं
कूँकना भूल ना जाए
इसलिए कभी कभास
बेमन से कूंक लेती
ना साथियों के साथ
खेल सकती
ना ही अंडे से सकती
खाने को जो दिया जाता
बेमन से खा लेती
उड़ने को आतुर
पिंजरे की दीवारों से
टकराती रहती
लाचारी में जीवन काटती
एक दिन सोचने लगी
इंसान इतना
निष्ठुर क्यों होता है?
खुद के
बच्चों के लिए जान देता  
अपने शौक के लिए
निर्दोष पक्षियों को बंदी
 बना कर रखता
इश्वर को मानने वाला
पक्षियों को क्यों मारता?
विधि का विधान कितना
निराला है
ताकतवर अपनी ताकत का
उपयोग
अपने से कमज़ोर पर ही
क्यों करता ?
पक्षियों के आँखों से
आंसूं भी तो नहीं आते
कैसे अपना
दर्द कहें किसी को?
अंतिम क्षण तक
घुट घुट कर जीने के सिवाय
कोई चारा भी तो नहीं
शायद परमात्मा उसकी
बात सुन ले
किसी तरह इंसान को
समझ आ जाए
कमज़ोर पर
अत्याचार करना छोड़ दे
उसे फिर से स्वतंत्र कर दे
आकाश में उड़ने दे
तभी मन में विचार आता ,
अब उड़ने की
आदत भी तो नहीं रही
कहीं ऐसा ना हो?
उड़ने के प्रयास में
कोई और
उसका शिकार कर ले
मैं यहीं ठीक हूँ
कम से कम जीवित तो हूँ ,
खाने के लिए भटकना तो
नहीं पड़ता
इश्वर की यही इच्छा है
तो फिर दुखी क्यों रहूँ
सोचते सोचते खुशी में
कोयल कूंकने लगी
मालिक की
आवाज़ सुनते ही सहम कर
चुपचाप एक कौने में
सिमट कर बैठ गयी
फिर से अपने को बेबस
लाचार समझने लगी
सकारात्मक सोच से फिर
नकारात्मक सोच में
डूब गयी
03-01-2012
10-10-01-12