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सोमवार, 10 दिसंबर 2012

उड़ता जो भी परिंदा आसमान में

उड़ता जो भी
परिंदा आसमान में
एक दिन ज़मीन पर
आता ज़रूर
क्यूं भूल जाता है
इंसान मगर
छूता ऊँचाइयाँ जब
दिमाग को भी अहम की
ऊंचाइयों पर रख देता
देखता नहीं ज़मीन से
जुड़े लोगों को कभी
भूल जाता अपनों को भी
गले उन्ही को लगाता
जो उनकी
हर बात पर मुस्कराता
झूठी तारीफ़ करता
भ्रम की
दुनिया में खो जाता
भूल जाता
रहता नहीं समय
किसी का इकसार कभी
इतना भी याद नहीं रखता
जब भी आयेगा ज़मीन पर
मिलेगा नहीं कोई बात
करने वाला भी कभी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
829-13-06-11-2012

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