ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

बुधवार, 12 दिसंबर 2012

कभी कभी इतना कमज़ोर कैसे हो जाता हूँ


कभी कभी 
कमज़ोर हो जाता हूँ
सच को झूठ
झूठ को सच मान
बैठता हूँ
पथ से भटक जाता हूँ
दुखों से घबरा कर
ह्रदय में डर बिठा लेता हूँ
संतुलन खो बैठता हूँ
शांत मन से सोचता हूँ
क्या स्वयं से
विश्वास खो बैठा हूँ
आत्ममंथन करता हूँ
नतीजे पर पहुंचता हूँ
पथ पर बने रहने के लिए 
धीरज रखना होगा
सहनशील बनना होगा
हिम्मत से लड़ना होगा
मुस्करा कर जीना है तो 
ईश्वर पर आस्था 
स्वयं पर विश्वास 
रखना होगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
आस्था,आत्म मंथन, जीवन  
832-16-06-11-2012
जीवन,सहनशील,धीरज,संतुलन,विश्वास,आत्ममंथन,हिम्मत

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 15/12/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत अच्छा संदेश देती रचना


    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  3. bahut acchi rachna...hum sabko aise samay say gujarna padta hai....rachna kay ant may apne sabko fir chalna sikhaya.....

    उत्तर देंहटाएं