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गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

इंसान बन कर जीना सिखा दे


हर आदमी
आसमान छूना चाहता
मीनारों से भी
बड़ा बनना चाहता
नीव का पत्थर 

कोई नहीं बनना चाहता
धरती पर रह कर भी
इंसान बन कर 

जीना नहीं चाहता
स्वर्ग की तलाश में
बिना त्याग तपस्या
खुद को 

पुजवाना चाहता
गुलाब की सुगंध चाहता
खुद दुर्गन्ध फैलाता
वृक्ष की 

छाया लेना चाहता
देने में कंजूसी करता
परमात्मा कुछ दे ना दे
इंसान को सद्बुद्धि दे दे
ह्रदय को 
महक से 
भर दे
इंसान बन कर
जीना सिखा दे

डा.राजेन्द्र तेला,निरंतर

824-08-06-11-2012
अहम्,अहंकार,इच्छाएं,जीवन,संतुष्टी,परमात्मा

1 टिप्पणी:

  1. जीना सीखा दे .......इसके साथ साथ बस एक नेक इंसान भी बना दे ...ऐ-खुदा

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