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शनिवार, 29 दिसंबर 2012

अब अपनी ही परछाई से घबराने लगा हूँ (व्यंग्य)



(एक चुके हुए भ्रष्ट नेता और सरकारी अफसर की मन की व्यथा पर -व्यंग्य )
अब अपनी ही
परछाई से
 घबराने लगा हूँ
कहीं मेरा सच ना बता दे
डरने लगा हूँ
जब तक था बाहों में दम
जेब में अथाह धन
साथ में पद का ऊंचा कद
हर काम करता था
सच को गलत कहता था
अब बुढा गया हूँ
पद से हट गया हूँ
ना सत्ता में मेरा कोई बचा
ना ही मैं सत्ता में रहा
कभी ख्याल भी नहीं आया
अहम् की उड़ान भरता रहा
सत्य ईमान को बकवास
समझता रहा
परमात्मा को धोखा देता रहा
अब हर पल परमात्मा
याद आने लगा है
कर्मों की सज़ा के डर से
दम निकलने लगा है
कैसे छुपा रह जाए मेरा सच
इस कोशिश में
मस्तिष्क उलझा रहता है
अब अपनी ही
परछाई से घबराने लगा हूँ
कहीं मेरा सच ना बता दे
डरने लगा हूँ
868-52-28-11-2012
भ्रष्ट,भ्रष्टाचार ,

2 टिप्‍पणियां:

  1. इस रोचक रचना के लिए आभार -ऊँट पहाड़ के नीचे आ गया लगता है

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  2. अपना ही सच अब आ कर डराने लगा है :)

    उत्तर देंहटाएं