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शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

आकाश को नापने की चाह लिए



आकाश को नापने की
चाह लिए चिड़िया 
निरंतर
आकाश में उडती रही
भूल गयी
कितना भी उड़ लो
आकाश की 
थाह नहीं मिलती
मन की सारी इच्छाएं
पूरी नहीं होती
थक हार कर भूखी प्यासी
असंतुष्ट ही काल के
गाल में समा गयी
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
865-49-28-11-2012
इच्छाएं, संतुष्ट,संतुष्टी

1 टिप्पणी:

  1. संतोष में ही जीवन का सुख निहित है ----एक सार्थक रचना के लिए धन्यवाद !

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