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रविवार, 9 दिसंबर 2012

दिल ना जाने कितनी बार टूटा है



दिल ना जाने
कितनी बार टूटा है
तुम हमसे मोहब्बत का
मतलब पूछ रहे हो
हसरतों की उम्मीद में
रोता रहा है
तुम हमसे मंजिल का
पता पूछ रहे हो
आइना भी अब हमें
पहचानता नहीं
तुम हमारे घर का पता
पूछ रहे हो
तन्हाई अब हमारा घर
कब्रिस्तान हमारी मंजिल
तुम हमसे जीने का
मकसद पूछ रहे हो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
827-11-06-11-2012
दिल,मोहब्बत,

4 टिप्‍पणियां:

  1. behatareen****^^^**** तुम हमारे घर का पता
    पूछ रहे हो
    तन्हाई अब हमारा घर
    कब्रिस्तान हमारी मंजिल
    तुम हमसे जीने का
    मकसद पूछ रहे हो

    उत्तर देंहटाएं
  2. घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
    । लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज सोमवार के चर्चा मंच पर भी है!
    सूचनार्थ!

    उत्तर देंहटाएं
  3. तन्हाई अब हमारा घर
    कब्रिस्तान हमारी मंजिल
    तुम हमसे जीने का
    मकसद पूछ रहे हो.

    बहुत खूब. सुंदर प्रस्तुति.

    उत्तर देंहटाएं

  4. ऐसी भी क्या वीरानी है ,कब्रिस्तान को देख के घर याद आया .बढ़िया रचना है निरंतर जी ऐसे ही एक तरफ़ा कलम चलाते रहो .

    उत्तर देंहटाएं