ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

रविवार, 30 दिसंबर 2012

आराम से सोये तो तीन आ जाएँ ,कसमसाकर सोना हो तो चार



आजादी से आज तक 
===========
आराम से सोये
तो तीन आ जाएँ
कसमसाकर सोना हो तो चार
ठूंस ठांस कर सोना हो तो पांच
पर गरीब की झोंपड़ी थी
आजादी से आज तक
उतनी ही है
चार पांच हाड मांस के पुतले
उसमें ज़िंदा रहते
कोई रात भर खांसता,
कोई जुखाम में नाक
सुड़कता रहता
बाकी बचे लोग ना रुकने वाली
आवाजों के कारण जागते रहते
सवेरे अधसोए अधजगे उठते
पेट भरने के लिए
काम पर निकल पड़ते
रात को थक चूर कर
पहले से अधिक कमज़ोर लौटते
इसी झोंपड़ी में एक से दो हुए
फिर दो से तीन,चार,पांच हुए
कुछ साल में
कभी एक कम हो जाता
तो कभी एक नया जुड़ जाता
झोंपड़ी में
आजादी के बाद बिजली का
एक मरियल सा लट्टू
अवश्य लटक गया
जिसने रात के अँधेरे को तो
कम कर दिया
पर ज़िन्दगी के अँधेरे को
कम ना कर सका
ज़िन्दगी आजादी के पहले भी
लडखडाती थी
लूले लंगड़े प्रजातंत्र में
आज भी लडखडा रही है
देश में और कुछ
बदला ना बदला हो
गरीब की झोंपड़ी नहीं बदली
ऐतहासिक धरोहर सी
अब भी आजादी से पहले की
याद दिलाती है

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
869-53-28-11-2012
व्यंग्य,आज़ादी ,आजादी,देश,गरीबी,भुखमरी,प्रजातंत्र


5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुंदर प्रस्तुति,,,,

    चिरनिद्रा में सोकर खुद,आज बन गई कहानी,
    जाते-जाते जगा गई,बेकार नही जायगी कुर्बानी,,,,

    recent post : नववर्ष की बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  2. दिल को छू लेने वाली रचना ,व्यंग की धार बहुत तेज है

    उत्तर देंहटाएं
  3. मन कुंठित हो उठता है कि हम अपने हाथों में आज़ादी होते हुए भी गुलामी से जी रहे हैं। बहरहाल, सार्थक सटीक अभिव्यक्ति है।
    सादर
    मधुरेश

    उत्तर देंहटाएं
  4. आज़ाद भारत में आज भी कुछ नहीं बदला ....बस रूप-रंग बदल गया

    उत्तर देंहटाएं