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सोमवार, 24 दिसंबर 2012

रात आँख लगी ही थी




रात आँख लगी ही थी
टिटहरी की आवाज़ ने
जगा दिया
खिड़की में टिटहरी को
बैठे देख रात में टिटहराने का
कारण पूछ लिया
टिटहरी ने खिड़की
खुली रखने का धन्यवाद दिया
साथियों से बिछड़ गयी हूँ
नीड का रास्ता भूल गयी हूँ
कमरे की खिड़की खुली न होती,
तो रात भर भटकती रहती
उसकी बात ने मुझे झंझोड़ दिया
मैं सोचने लगा क्यों इंसान
बड़े उपकार तक भूल जाता है
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

857-41-23-11-2012
उपकार,धन्यवाद,स्वार्थ

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