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शनिवार, 22 दिसंबर 2012

कू-ब-कू भटकता रहा



कू-ब-कू भटकता रहा
दर्द बिना कोई न मिला
जो भी मिला उसने कहा 
कैसे कहूं कोई दर्द नहीं है 
एक शख्श हँसता मिला
मैंने पूछा 
क्या तुम्हें कोई गम नहीं
नम आँखों से कहने लगा
क्यूं मेरी बात पर 
यकीन नहीं करते 
कह तो रहा हूँ
मुझे कोई दर्द नहीं
कहते कहते 
वह अश्क बहाने लगा
मैं भी जिद पर अड़ गया
उसके दर्द को बढ़ा दिया
फिर सवाल दाग दिया
इतना रो रहे हो
फिर भी क्यूं कहते हो
तुम्हें कोई दर्द नहीं
वो फूट फूट कर रोने लगा
सुबक सुबक कर कहने लगा
कुछ लम्हे मन को
सुकून देने के लिए कहता हूँ
मुझे कोई दर्द नहीं
तुमने वह भी नहीं करने दिया
डा.राजेंद्र तेला,निरन्तर 


कू-ब-कू =गली गली ,जगह जगह
852-36-20-11-2012
जीवन ,ज़िन्दगी ,दुःख,दर्द,सुकून

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