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गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

काव्यात्मक लघु कथा -अब भी कुछ युवा संस्कारों में जीते हैं


काव्यात्मक लघु कथा -अब भी कुछ युवा संस्कारों में जीते हैं
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बूढ़े बाबा ने 
दरवाजा खोला
मुझे देखते ही 
बाबा के मुंह से निकला 
बेटा तो घर पर नहीं है
किससे मिलना है
मैं बोला बाबा आपसे
बाबा चौंक कर कहने लगे
बेटा सांस लेना पेट
भरना भी 
दूसरों पर निर्भर है
तो मुझसे मिलने कोई
क्यों आयेगा
किसी को मुझसे कोई 
काम नहीं
फिर मेरी परवाह
क्यों करेगा
वैसे भी आजकल
बिना काम कोई किसी से
मिलना नहीं चाहता
बिना काम मिलना
समय व्यर्थ करने 
जैसा लगता है 
तुम अपवाद लगते हो
ज़माने की
चाल नहीं चलते हो
मैं बोला
बाबा इस ज़माने में भी
सारे युवा पथ से 
भटके हुए नहीं हैं
अब भी कुछ
युवा संस्कारों में जीते हैं
बच्चे से बूढों तक
सब का ध्यान रखते हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
823-07-06-11-2012
बुढापा,युवा,संस्कार,पीढी,  अंतराल जीवन,selected

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति .... बुज़ुर्गों को थोड़ी राहत देती हुई रचना

    उत्तर देंहटाएं
  2. सारे युवा
    पथ से भटके हुए नहीं हैं
    अब भी कुछ
    युवा संस्कारों में जीते हैं
    बच्चे से बूढों तक
    सब का ध्यान रखते हैं,

    भावपूर्ण अभिव्यक्ति,,,,

    recent post: बात न करो,

    उत्तर देंहटाएं