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शनिवार, 1 दिसंबर 2012

दूर रह कर भी


कल रात
कमरे की खिड़की से
चाँद को झांकते
कमरे को
शीतल चांदनी से
नहलाते देखा तो
मन ने प्रश्न किया 
चाँद से पूछों
क्यों केवल चांदनी को 

भेज कर काम चलाता है
क्यों कभी
खुद नहीं आता है
ये कैसा रिश्ता
निभाता है
पूछने से पहले ही
चाँद समझ गया
मन क्या चाहता है
मुस्काराते हुए 

चाँद कहने लगा 
मित्रता का रिश्ता
निभाता हूँ
निरंतर दूर रह कर भी
प्रेम दर्शाता हूँ
चांदनी को नित्य
धरती पर भेजता हूँ
अँधेरे को दूर कर
तुम्हारा 

जीवन सुलभ करता हूँ
रिश्तों को 

निभाने के लिए
नित्य मिलना ही
आवश्यक नहीं होता
दूर रहते हुए भी
रिश्तों को
निभाया जा सकता
संवाद
बनाया जा सकता है
अनेकानेक तरीकों से
मित्र,मित्र की
मदद कर सकता है
शीतल चांदनी की
सुन्दर भेंट के साथ
चाँद सुन्दर सीख भी
दे गया
मन को भाव विव्हल
कर गया



© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

810-52-28-10-2012
चाँद ,चांदनी,रिश्ते,मित्र,मित्रता,selected

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