ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

समझ नहीं पाया जब देखा मैंने



समझ नहीं पाया
जब  हर शख्श को
चेहरे पर चेहरा लगा कर
घूमते देखा
मोहब्बत की जगह
ज़ख्म देते देखा
दिन रात खुदा की
इबादत करी
मिन्नतों के बाद
उसने राज़ बताया
ज़न्नत में बहुत बड़ा
घोटाला हो गया है
जिन्हें तुम
ज़मीन पर ढूंढ रहे हो
वो घबराकर
ज़न्नत में बस गए हैं
जिन्हें दोजख में
होना चाहिए था
वो ज़मीन पर पहुँच गए हैं
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
768-13-09-10-2012
घोटाला, ज़न्नत, दोजख

3 टिप्‍पणियां:

  1. Bahut hi sundar aur karara vyang,dipawli ke hardik subhkanao ke sath (nyee post- khada hai) जब खुदा से इबादत करी
    बड़ी मिन्नतों के बाद
    उसने राज़ बताया
    ज़न्नत में बहुत बड़ा
    घोटाला हो गया है
    जिन्हें तुम
    ज़मीन पर ढूंढ रहे हो
    वो घबराकर
    ज़न्नत में बस गए हैं
    जिन्हें होना चाहिए था
    दोजख में
    वो ज़मीन पर पहुँच
    गए हैं

    उत्तर देंहटाएं
  2. जिन्हें तुम ज़मीन पर ढूंढ रहे हो वो घबराकर ज़न्नत में बस गए हैं ...
    घोटाला या विडम्बना ... कुछ किया जा सके तो बिलकुल ये ज़मीन फिर से घोटाला-मुक्त हो जायेगी .. यही कामना है ..
    सादर
    मधुरेश

    उत्तर देंहटाएं
  3. जिन्हें होना चाहिए था
    दोजख में
    वो ज़मीन पर पहुँच
    गए हैं
    बहुत ही सटीक प्रहार करती रचना ...

    उत्तर देंहटाएं