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रविवार, 18 नवंबर 2012

मसरूफ रहता हूँ



आज कल बहुत
मसरूफ रहता हूँ
गम-ऐ-हयात
बर्दाश्त करने की
आदत डाल रहा हूँ
आसूं बहाए बिना
सहने की कोशिश 
कर रहा हूँ
बहारों को 
भुला रहा हूँ
खिजा से दोस्ती
करने में लगा हूँ
आज कल बहुत
मसरूफ रहता हूँ
डा.राजेन्द्र तेला,निरंतर
785-27-24-10-2012
मसरूफ, ग़म , गम-ऐ-हयात

1 टिप्पणी:

  1. बहुत ख़ूब!
    आपकी यह सुन्दर प्रविष्टि कल दिनांक 19-11-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-1068 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

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