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शनिवार, 27 अक्तूबर 2012

क्यों लोग पल पल में अपनी फितरत बदलते



क्यों लोग पल पल में
अपनी फितरत बदलते
देख कर भी अनदेखा करते
आशंकाओं से घिरे रहते
मन में कुंठा
दिल में भ्रम पालते
क्यों इतने विचलित रहते
हंसना चाहते
पर मुस्कारा भी नहीं पाते
असहज ही जीते रहते
740-36-19-09-2012
कुंठा ,फितरत,असहज,आशंकाएं,विचलित,प्रवत्ति

2 टिप्‍पणियां:

  1. ये आज के युग में जीने की नई परिभाषा है जो एक न्य सवाल हर जहां में छोड़ जाती है | सवाल करती रचना अच्छी लगी |

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुन्दर प्रस्तुति!
    ईद-उल-जुहा के अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएँ|

    उत्तर देंहटाएं