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बुधवार, 31 अक्तूबर 2012

टहलते टहलते



आज टहलते टहलते
पेड़ के नीचे बैठे एक 
परिचित बुजुर्ग 
सज्जन मिल गए
अकेले बैठे रहने का 
कारण पूछा
नम आँखों से कहने लगे 
अकेले रहने के अलावा 
कोई चारा भी नहीं
बुढ़ापे में ना कोई सुनता ,
ना समझता 
कुछ कहने से पहले ही
चुप कर दिया जाता हूँ 
निरंतर
प्रताड़ित होता हूँ 
मेरे लिए किसी के पास
समय नहीं
सब अपने काम में व्यस्त हैं
व्यथित हो कहीं जाने का 
प्रयत्न करता हूँ 
तो थोड़ी दूर चल कर 
थक जाता हूँ 
वैसे भी डूबते सूरज को
कौन नमस्कार करता है
अब बेबसी सहारा है
सुबह दो रोटी लेकर
घर से निकलता हूँ
पेड़ के नीचे दिन 
गुजारता हूँ
आने जाने वालों को 
देख कर
मन लगाता हूँ
कोई पास आ जाता तो
दो बात कर लेता हूँ
इसी तरह दिन गिनता
रहता हूँ

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
747-43-23-09-2012
बुढापा,बूढा,बूढ़े,बुजुर्ग,जीवन
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
E

2 टिप्‍पणियां:

  1. vakayee me behad marmsparsi rachana वैसे भी डूबते सूरज को
    कौन नमस्कार करता है
    अब बेबसी सहारा है
    सुबह दो रोटी लेकर
    घर से निकलता हूँ
    पेड़ के नीचे दिन गुजारता हूँ
    आने जाने वालों को देख कर
    मन लगाता हूँ
    कोई पास आ जाता तो
    दो बात कर लेता हूँ
    इसी तरह दिन गिनता
    रहता हूँ

    उत्तर देंहटाएं