ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

शनिवार, 20 अक्तूबर 2012

फूल मुरझा चुका था


फूल
मुरझा चुका था
पंखुड़ियां 
बिखर चुकी थी
महक हवा में 
मिल चुकी थी
किसी गले में 
हार बना कर 
पहनाया गया था 
अब धरती चूम रहा था
पैरों तले रौंदा
जा रहा था
इंसान की फितरत से
नावाकिफ था
अपनों तक को नहीं
बख्शता
फिर उसे कैसे बख्शता
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
07-09-2012
729-25-09-12
इंसान,फूल,फितरत ,स्वार्थ,स्वार्थी, selected, 

4 टिप्‍पणियां:

  1. अपनों तक को नहीं
    बख्शता
    फिर उस को कैसे
    बख्शता

    .. सुन्दर प्रस्तुती
    बधाई स्वीकारें। आभार !!!

    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत हैं http://rohitasghorela.blogspot.com/2012/10/blog-post_17.html

    उत्तर देंहटाएं
  2. भाव पूर्ण मर्मस्पर्शी कोमल अभिव्यक्ति....आभार एवं शुभ कामनाएं ..

    उत्तर देंहटाएं
  3. भाव पूर्ण मर्मस्पर्शी कोमल अभिव्यक्ति....आभार एवं शुभ कामनाएं ..

    उत्तर देंहटाएं