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सोमवार, 29 अक्तूबर 2012

एक इच्छा और क्यों बढाऊँ



पानी  से भरे
बादल के टुकड़े ने
आज फिर मुझे लुभाया
मुझे उकसाने लगा
उसे अपने मन के
खेत में बरसा दूं
इच्छाओं की
सूखती फसल फिर से
लहलहाने लगेगी
विचारों ने मोड़ लिया
कहीं अधिक बरस गया तो
कुछ भी हाथ नहीं लगेगा
फसल पूरी तरह गल जायेगी
मन को समझाया
इस बार सावन नहीं बरसा
तो क्या हुआ
अगले बरस अवश्य
बरसेगा
मन को संतुष्ट किया
इश्वर की कृपा रहेगी तो
सब ठीक हो जाएगा
कितनी भी इच्छाएं रखूँ
सब तो
वैसे भी पूरी नहीं होती
एक इच्छा और क्यों बढाऊँ
जो ऊपर वाले ने दिया है 
क्यों ना उसमें ही संतुष्ट रहूँ
कॉपीराइट@

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
743-39-20-09-2012
संतुष्टी,संतुष्ट,इच्छाएं,इच्छा ,जीवन ,आकांशाएं

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