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सोमवार, 15 अक्तूबर 2012

ह्रदय के द्वार पर

हृदय के द्वार पर
निरंतर
खट खट तो होती है
मगर मजबूरियां,
जिम्मेदारियां
कर्तव्य पथ से
भटकने नहीं देती
भावनाओं को
नियंत्रण में रखती हैं
द्वार पर खड़े
चाहने वालों के लिए
चाहते हुए भी
द्वार नहीं खोलने देती
बाहर खड़े
लोगों की पुकार
निरंतर
कानों में गूंजती रहती
दौड़ कर बार बार
द्वार तक पहुंचता हूँ
कर्तव्य का ध्यान आते ही
कदम पीछे लौटाता हूँ
जानता हूँ
जीवन में हर इच्छा की
पूर्ती नहीं हो सकती
इच्छाएं,आकांशाएं
सर उठाती रहती हैं
ज्वार भाटे सी
आती जाती हैं
उन पर नियंत्रण
सही दिशा देना भी
आवश्यक है
संयम से काम लेता हूँ
मन को समझाता हूँ
हृदय को पुचकारता हूँ
खुशी से तय करता हूँ
ह्रदय द्वार बंद ही रखूँ
कहीं ऐसा ना हो
जो मेरे अपने हैं
हृदय में बसे हैं
अपने आप को
पराया समझने लगे
उनके प्रति
असीम प्यार और मोह
क़दमों का संतुलन
बनाए रखता है
मुझे लडखडाने नहीं देता
यह पता होते भी
मेरे चाहने वालों के
ह्रदय को ठेस पहुंचेगी
अगर वे ह्रदय से
मुझे चाहते हैं
तो मेरी जिम्मेदारियों
मजबूरियों को समझ कर
क्षमा कर देंगे
मूक रह कर पहले से
अधिक चाहते रहेंगे
कर्तव्य पथ से नहीं
भटकने देंगे
मैं उनके मन में
वो मेरे मन में बसे रहेंगे
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर     
03-09-2012
722-18-09-12
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