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शनिवार, 20 अक्तूबर 2012

ना जाने क्यों



ना जाने क्यों
लोग मन को मारते हैं
खुद को समेट लेते हैं
दहशत में जीते हैं
क्यों जीवन को
सहजता से नहीं लेते हैं
कुंठाओं के जाल से
मुक्त नहीं होते हैं
सोच के
पैमाने नहीं बदलते हैं
जीवन भर
गीली लकड़ी जैसे
सुलगते रहते हैं
जलते कम
धुंआ अधिक देते हैं
खुद भी व्यथित रहते हैं
दूसरों को भी व्यथित
करते हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
07-09-2012
728-24-09-12
सोच,कुंठा,सहजता,व्यथित,जीवन

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