ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

मंगलवार, 2 अक्तूबर 2012

क्यों फ़िक्र करूं?



क्यों फ़िक्र करूं?
जो भी कहता हूँ
कहता हूँ
उनके भले के लिए
उन्हें परवाह नहीं तो
फिर मैं क्यों फ़िक्र करूं
मेरे प्यार को
जब नहीं समझ सके
तो मेरी फ़िक्र को
क्या समझेंगे
उनकी फ़िक्र में
खुद को क्यों दुखी करूँ
अब उम्मीद नहीं
समझेंगे मुझे कभी
वो अपने में मस्त
उन्हें मस्त ही रहने दूँ
क्यों रंग में भंग करूं
जब आयेगी खुद के
सर पर
खुद-ब -खुद समझ
जायेंगे
क्या होता है फर्क
अपने और पराये में
21-08-2012
686-46-08-12
पीढी  अंतराल ,अपने ,पराये, फ़िक्र
(पीढी  अंतराल (Generation Gap)के कारण छोटे,बड़ों की बात नहीं मानते हैं तो
हताशा में जो विचार मन में उठते हैं ,उन्हें दर्शाती है यह रचना )

1 टिप्पणी: