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मंगलवार, 16 अक्तूबर 2012

जो मिल गया उसकी कद्र नहीं



जो मिल गया
उसकी कद्र नहीं
जो नहीं मिला
निरंतर उसके सपने
देखता इंसान
देखे जो भी सपने पहले
पूरे हो जाते तो 
 भूल जाता इंसान
नयी इच्छाएं संजोने
लगता
नए सपने देखने लगता
भूल जाता
कभी रुकता नहीं
इच्छाओं का संसार
जो फंस गया
इच्छाओं के चक्रव्यूह में
फिर निकल नहीं पाता
कभी बाहर
जीना भूल जाता
बेचैनी मोल लेता
उलझ कर रह जाता
उसका संसार
जितनी
ज़ल्दी मुक्ती पालो
इच्छाओं से
जीवन उतना ही
साकार
06-09-2012
723-19-09-12
जीवन ,बेचैनी,इच्छाओं के चक्रव्यूह ,इच्छाओं का संसा,.सपने,इच्छाएं

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