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सोमवार, 15 अक्तूबर 2012

हम भी काँटों से घिरे हुए हैं


गुलाब  की तरह
हम भी काँटों से
घिरे हुए हैं
ज़हन में नफरत के
कांटे बसाए लोग
सुकून की पंखुड़ियों को
छेदने की कोशिश में
लगे हुए हैं
पर हम गुलाब जितने
भाग्यशाली नहीं
बार बार हैरान तो होते हैं
दर्द से करहाते भी हैं
मगर गुलाब से
मुस्काराना  सीखा
वो हमें रोने नहीं देता
हम हालात को खुशी से
बर्दाश्त करते रहते
चेहरे से मुस्काराहट को
जाने नहीं देते
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
03-09-2012
721-17-09-12
नफरत,सुकून,मुस्काराना ,मुस्काराहट

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