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शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2012

सब होड़ में जी रहे हैं



सब होड़ में जी रहे हैं
भीड़ में दौड़ रहे हैं
ये भी पता नहीं जाना
कहाँ है
नींद खो रहे हैं
चैन खो रहे हैं
ऊपर से ढिंढोरा पीट
रहे हैं
चैन की तलाश में ये
सब कर रहे हैं
कौन समझाए उन्हें
इच्छाओं के जाल में
फंस कर
किसे चैन मिला है
जो उन्हें मिल जाएगा
माया मोह में
ज़िन्दगी भर रोते रहे हैं
रोते ही रह जायेंगे
ना चैन मिलेगा
ना संतुष्टी मिलेगी
खाली हाथ आये थे
खाली हाथ चले जायेंगे

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
02-09-2012/715-12-09-12
संतुष्टी ,होड़,चैन,भीड़,इच्छाएं ,जीवन,ज़िन्दगी,

5 टिप्‍पणियां:

  1. ये भी पता नहीं जाना
    कहाँ है
    नींद खो रहे हैं
    चैन खो रहे हैं
    ऊपर से ढिंढोरा पीट
    रहे हैं
    चैन की तलाश में ये
    सब कर रहे हैं ..........................shayad ham bhi un mai se ek hain

    उत्तर देंहटाएं
  2. महान कर्मठ कर्मयोगी जो निरंतर निस्वार्थ अपने पथ पर अग्रसर है, वह एकमात्र राजेंद्र तेला ही है!
    ....हुकम चन्द भास्कर

    उत्तर देंहटाएं
  3. खाली हाथ आये थे
    खाली हाथ चले जायेंगे
    बिल्‍कुल सही कहा है आपने इन पंक्तियों में

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
      आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (13-10-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
      सूचनार्थ!

      हटाएं
  4. पता नहीं किस आपा धापी में जी रहे है ,और इसी तरह ये जिंदगी बीत जाएगी ,

    उत्तर देंहटाएं