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शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

मन का रिश्ता



घर से बाहर निकलते ही
एक लावारिस कुत्ता
मेरे पास आया
पूछ हिलाकर अभिवादन
करने लगा
मैंने भी उसे स्नेह से
पुचकार लिया
तीन वर्ष तक यही क्रम
निरंतर चलता रहा
समय एक साथ
हमारे बीच एक
अजीब सा रिश्ता हो गया
वह घर के बाहर मेरा
इंतज़ार करता
किसी दिन वह नहीं
दिखता
तो मन व्याकुल होने
लगता
उसकी प्रतीक्षा करता
ना उसे मुझ से
ना ही मुझे उससे कोई
आशा थी
हमारे मन का रिश्ता
दिन प्रतिदिन
प्रघाढ होता गया
सांयकाल दफ्तर से
घर लौटते  समय भी
मिलना आवश्यक हो गया 
अचानक
समय ने पलटा खाया
उसका दिखना बंद हो गया
कई दिन
व्याकुल व्यथित रहा
फिर भी उसे भूल ना पाया
पर एक प्रश्न ने
मन में जन्म अवश्य दे दिया
क्यों इंसान हर रिश्ते को
नाम देता
रिश्तों में मंतव्य ढूंढता
उन्हें शक से देखता
जब भी उस लावारिस
कुत्ते की याद आती है
आँखें नम हो जाती हैं
इंसानी रिश्तों की स्थिती
देख कर
मन में अजीब सी टीस
उठने लगती है
03-08-2012
642-02-08-12

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार साक्षरता दिवस 08/09/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (08-09-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

    उत्तर देंहटाएं
  3. हमारे मन का रिश्ता
    दिन प्रतिदिन
    प्रघाढ (प्रगाढ़ )होता गया
    बढ़िया रचना है .आभार .ram ram bhai
    शुक्रवार, 7 सितम्बर 2012
    शब्दार्थ ,व्याप्ति और विस्तार :काइरोप्रेक्टिक

    उत्तर देंहटाएं
  4. जहां कोई अपेकषा न हो रिश्ते वहीं सांस ले पाते हैं

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर रचना..
    रीश्ता निःस्वार्थ भाव से निभाया जाये
    तो ही अपनापन आता है..
    और प्रेम बढ़ता है...
    :-)

    उत्तर देंहटाएं
  6. सच में अजीब से रिश्ते हैं ...

    उत्तर देंहटाएं