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गुरुवार, 6 सितंबर 2012

हम खुद में इतने पागल हैं

हम खुद में इतने पागल हैं
अपनों को दुश्मन समझते हैं
ज़हर को अमृत समझ कर पीते हैं
खुशहाली हमको पसंद नहीं
बदनामी का डर नहीं
खुद के हाथों से 
खुद को आग लगाते हैं
खुद बेचैन रहते हैं
दूजे का चैन छीनते हैं
न खुद सो पाते हैं
न दूजों को सोने देते हैं
हँसती गाती ज़िन्दगी को
आंसूओं से भर देते हैं
हम खुद में इतने पागल हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
31-07-2012
640-37-07-12

1 टिप्पणी:

  1. एकदम सही है..
    इतने पागल हो गए है की सही
    गलत नहीं समझ पाते..

    उत्तर देंहटाएं