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गुरुवार, 13 सितंबर 2012

तेरी यादों में डूबा हुआ



तेरी यादों में डूबा
समंदर किनारे बैठा हूँ
आती जाती लहरों को
देख रहा हूँ
कैसे मंजिल को छू कर
समंदर से 
मिलने से पहले लहरें
अपना निशाँ छोड़ जाती हैं
क्यूं तुम ऐसा नहीं करती ?
माना की मंजिल
बदल चुकी तुम्हारी
फिर भी
इतना तो याद होगा तुम्हें
कभी मैं ही था मांझी
किश्ती का तुम्हारी
मेरे रकीब से मिलने से पहले
मुझसे मिल कर लौट जाना
तुम्हारे छोड़े हुए निशानों
के सहारे ही उम्र गुजार दूंगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
13-08-2012
657-17-08-12

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