ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

मंगलवार, 25 सितंबर 2012

हार किसी को मंज़ूर नहीं



चार दिनों का
सब्र भी नहीं किसी को
पल पल भारी लगता 
जीवन का
जब अहम् हो गया 
जान से प्यारा
क्या करना फिर
दोस्त और दोस्ती का
जो भी रह गया होड़ में पीछे
वही हारा कहलाता
हार किसी को मंज़ूर नहीं
क्या अपना क्या पराया
प्यार मोहब्बत गए भाड़ में
हर इंसान
फिर दुश्मन लगता

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
21-08-2012
673-33-08-12,

3 टिप्‍पणियां:

  1. सही कहा आपने, हार किसी को स्वीकार नहीं होती है...!

    उत्तर देंहटाएं
  2. आज की भागम भाग से ओत-प्रोत जीवन शैली ,किसी से पीछे न रह जाने की उहापोह व्यक्त करती कविता

    उत्तर देंहटाएं
  3. जीवन की आप-धापी में न धैर्य न हार स्वीकार -जीवन इतने तक ही सीमित हो गया है

    उत्तर देंहटाएं