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गुरुवार, 27 सितंबर 2012

आहें



बरसात की छोटी बूंदों के साथ
कुछ आहें भी गिरी होंगी ज़रूर
जो छोड़ गए ज़मीं से साथ हमारा
उनके आंसू भी गिरे होंगे ज़रूर
जो बस गए जा कर ज़न्नत में
हमें याद करके रोते होंगे ज़रूर

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
21-08-2012
677-37-08-12
शायरी, दोस्त,आहें

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