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मंगलवार, 25 सितंबर 2012

जब उम्र का बोझ बढ़ जाए



जब उम्र का
बोझ बढ़ जाए
लाचारी जीवन का
सच बन जाए
मजबूरी में जीना
पड़ता है
कदम कदम पर
समझौता करना
पड़ता है
बाप को बेटा बन कर
रहना पड़ता है
फिर भी हँसते हुए
दिखना होता है
बहुत खुश हूँ
कहना पड़ता है
21-08-2012
672-32-08-12,
बुढापा,उम्र,लाचारी,जीवन ,मजबूरी

1 टिप्पणी:

  1. इस वक्त की पीर और विडंबना है यह रचना .बस एक संशोधन कर लिया जाए .साक्षी भाव से दृष्टा बन मुस्काया जाए ,गिला न किया जाए .ram ram bhai
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    मंगलवार, 25 सितम्बर 2012
    दी इनविजिबिल सायलेंट किलर

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