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शनिवार, 22 सितंबर 2012

उनकी खुशी के लिए



चाहने वाले
चाहते हैं
उनकी खुशी के लिए
अपना वजूद ही खो दूं
मैं सोचता हूँ
क्यों न खुद को ही
नेस्तनाबूद कर दूं
मौत का इलज़ाम
खुद पर ही लगा दूं
उन्हें तकलीफों से
बरी कर दूं

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
21-08-2012
667-27-08-12

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (23-09-2012) के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    सूचनार्थ!

    उत्तर देंहटाएं
  2. मेरी मौत का इलज़ाम
    खुद पर ही लगा दूं
    उन्हें तकलीफों से
    बरी कर दूं.

    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति. छोटी सी कविता गंभीर उर्जा से परिपूर्ण.

    उत्तर देंहटाएं
  3. जो सच में आपको चाहते होंगे... वो ऐसा कभी नहीं चाहेंगे...
    और जो ऐसा चाहेगें ...वो आपको कभी नहीं चाहेंगें.....

    ~सादर !!!

    उत्तर देंहटाएं