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सोमवार, 10 सितंबर 2012

न तुम्हारी जीत ज़रूरी ,न मेरी हार ज़रूरी



न तुम्हारी जीत ज़रूरी
न मेरी हार ज़रूरी
दिलों में 
नज़दीकी ज़रूरी
मैं हार भी जाऊं
पर दिल से नहीं लगाऊँ
तुम जीत भी जाओ
गर सर पर न चढाओ
अहम् से न भर जाओ
दिल आपस में 

वैसे ही मिलते रहेंगे
न इक दूजे से 
यकीन उठेगा
न दिलों में फासला बढेगा
मुझे हार में भी 
जीत का मज़ा मिलेगा
तुम जीत कर भी
दिल हार जाओगे
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
03-08-2012
649-09-08-12

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी ये
    जीत-हार
    का किस्सा
    आज
    अकेले पढ़ने का
    मन नहीं है
    लिये जा रही हूँ इसे
    मिल-बैठ कर पढ़ेंगे
    नई-पुरानी हलचल में
    इसी बुधवार को
    आप भी आइये न
    साथ रहेगा
    सादर
    यशोदा

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  2. ये हार-जीत का खेल,बहुत ही मनभावन |

    उत्तर देंहटाएं
  3. jeet kar bhi haarna haar kar bhi jeetnaa bahut khoobsoorat banaa detaa hai jeevan ko

    उत्तर देंहटाएं
  4. जीत कर भी दिल हारना और हार कर भी दिल को जीत लेना ही तो प्यार है । सुंदर प्रस्तुति ।

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